शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
उद्धरन्ति कृमीनङ्गाद्दशमानान्कषन्ति च ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय़ पुष्कलम् ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
उद्धरन्त्यसुखाविष्टा मूर्छमानाः पुनः पुनः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
उद्धरन्निव काय़ेभ्यः शिरांसि शरवृष्टिभिः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
उद्धरिष्यामि ते सद्यः सामात्यसुतवान्धवम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादय़ेत् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
उद्धरेद्दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ||
३८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
उद्धर्तुं वा चालय़ितुं द्रौणिः परमदुर्मनाः |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
उद्धर्तुकामो मतिमान्पुत्रो जज्ञे पुरन्दरः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
उद्धवो वा महावुद्धिर्वृष्णीनामर्चितो नृप ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
उद्धारय़ामास तदा धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
उद्धुक्षितश्च पुत्रेण तव क्रोधहुताशनः |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
उद्धुन्वंश्च महारेणुं कम्पय़ंश्चापि मेदिनीम् ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
उद्धुन्वन्तोऽपरे रेणून्समाजग्मुः समन्ततः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
उद्धूतं सहसा भौमं नागाश्वरथसादिभिः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
उद्धूतत्वात्तु रजसः प्रसेकाच्छोणितस्य च |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
उद्धूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
उद्धूता रजसो वृष्टिः शरवृष्टिस्तथैव च |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
उद्धूतानां यथा वृष्ट्या सागराणां भय़ावहः ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
उद्धृतश्च भवेच्छल्यो मम द्वादशवार्षिकः |
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
उद्धृता वारुणी लक्ष्मीरमृतं चापि मातले |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
उद्धृत्य गङ्गासलिलात्ततो मत्स्यं मनुः स्वय़म् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
उद्धृत्य चैनां तरसा तस्मात्कूपान्नराधिपः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
उद्धृत्य तु वपां तस्य यथाशास्त्रं द्विजर्षभाः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
उद्धृत्याददते चापो जीमूतेभ्योऽम्वरेऽनिलः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
उद्धृत्यालिञ्जरात्तस्मात्ततः स भगवान्मुनिः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
उद्भवः क्षेमकश्चैव वाटधानश्च पार्थिवः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः |
९८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
उद्भावन मनोद्भाव जय़ व्रह्मजनप्रिय़ ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
उद्भावनमकुर्वन्तो विदुरस्य मते स्थिताः ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
उद्भावनमकुर्वन्तो विदुरस्य मते स्थिताः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
उद्भावनार्थं भवतो वंशस्य नृपसत्तम ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
उद्भावय़ कुलं मग्नं त्वत्कृते स्वय़मेव हि ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
उद्भावय़स्व वीर्यं वा तां वा गच्छ ध्रुवां गतिम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
उद्भासते ह्यञ्जनविन्दुवत्त; च्छुक्ले वस्त्रे यद्भवेत्किल्विषं वः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
उद्भासितश्च सविता देवास्त्राता हतासुराः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
उद्भिज्जाः स्थावराः प्रोक्तास्तेषां पञ्चैव जातय़ः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
उद्भिज्जानीति तान्याहुर्भूतानि द्विजसत्तमाः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
उद्भिदस्त्रिक्रमो वैद्यो विरजो विरजोम्वरः ||
१४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
उद्भिन्नरुधिरः कर्णः क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
उद्भिन्नरुधिरो राजन्प्रभिन्न इव कुञ्जरः ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
उद्भिन्नरुधिरौ कृष्णौ भारद्वाजस्य साय़कैः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
उद्भिन्नरुधिरौ शूरौ मद्रराजय़ुधिष्ठिरौ ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
उद्भूता राजवंशेषु ये भूय़ो भारते हताः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
उद्भूतार्थं हि पुरुषं विशिष्टतरय़ोनय़ः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
उद्भ्रान्तं स्थानमास्थाय़ तस्थौ गिरिरिवाचलः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
उद्भ्रान्तः प्राविशं घोरामटवीं दैवमोहितः ||
१७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
उद्भ्रान्तनय़नैर्वक्त्रैः सन्दष्टोष्ठपुटैः शुभैः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
उद्भ्रान्तैस्तुरगैः सोऽथ द्रवमाणैः समन्ततः |
३३ क