आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
रक्षां च विदधे तत्र भिषजश्चौषधानि च |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
रक्षां तु मे चिन्तय़ देवराज; यथा त्वदर्थं रक्षिताहं चरेय़म् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
अग्निरु उवाच
रक्षांसि चापवर्तन्ते स्थिते देवे विभावसौ ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय
११३
विभाण्डक उवाच
रक्षांसि चैतानि चरन्ति पुत्र; रूपेण तेनाद्भुतदर्शनेन |
१ क
वन पर्व
अध्याय
११३
लोमश उवाच
रक्षांसि तानीति निवार्य पुत्रं; विभाण्डकस्तां मृगय़ां वभूव |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति; सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षांसि वै हिमवति हेमकूटे तु गुह्यकाः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
रक्षांस्यपावधीत्तत्र पन्थानं चाप्यविन्दत ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
रक्षाधिकरणं युद्धं तथा धर्मानुशासनम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
रक्षामहे नरव्याघ्र स्वशरीरं हि नो भवान् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
रक्षामेव प्रशंसन्ति धर्मं धर्मभृतां वर |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
रक्षार्थं तापसानां च राघवो धर्मवत्सलः |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
रक्षार्थं सर्वभूतानां विष्णुत्वमुपजग्मिवान् ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
रक्षार्थमभ्यधावन्त सौभद्रं त्वरिता रथैः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
रक्षार्थमेवामृतस्य ददर्श भुजगोत्तमौ ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
रक्षार्थे लक्ष्मणं न्यस्य प्रय़यौ मृगलिप्सय़ा ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
रक्षाविधानं मनसा स विचिन्त्य महातपाः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
रक्षिणश्च समुद्दिश्य प्राय़ाचत्पृथिवी तदा |
६५ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
रक्षिणां ह्यात्तशस्त्राणां स्थानं पश्चाद्विधीय़ते |
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
मातलिरु उवाच
रक्षितं कालकेय़ैश्च पौलोमैश्च महासुरैः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
धृतराष्ट्र उवाच
रक्षितं द्रोणकर्णाभ्यामप्रवेश्यं सुरैरपि ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षितं द्रोणकर्णाभ्यामश्वत्थाम्ना कृपेण च |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
युधिष्ठिर उवाच
रक्षितं पुरुषव्याघ्रैर्महेष्वासैः प्रहारिभिः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
रक्षितं मद्रराजेन कृपेण च महात्मना |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
रक्षितं राजभिः पूर्वैर्धर्मविद्भिर्महात्मभिः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
रक्षितं वालिना यत्तत्स्फीतं मधुवनं महत् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
रक्षितं वृषसेनेन सुषेणेन च धन्विना ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
रक्षितः परमेष्वासैः कृपप्रभृतिभी रथैः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
रक्षितः सत्यसन्धेन भारद्वाजेन धीमता ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
रक्षितव्यं तु राजन्यैरुपय़ोज्यं द्विजातिभिः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
रक्षितव्याः प्रजा राज्ञा तास्त्वं रक्षितुमर्हसि ||
१३ ग
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
रक्षितव्यो महावाहो सर्वास्वापत्स्विति प्रभो |
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
रक्षितव्यो रथी नित्यमिति कृत्वापय़ाम्यहम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
रक्षिता त्वद्गुणैरेषा पतिव्रतगुणैस्तथा |
८१ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
रक्षिता धन्विनां श्रेष्ठः साक्षादिव मनुः स्वय़म् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
रक्षिता पुण्यभाग्राजा प्रजानां त्वं त्वपुण्यभाक् ||
६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
रक्षिता सा त्वय़ा पुत्र मम चापि निवेदिता |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
रक्षितां गुरवे भार्यां न्यवेदय़दनिन्दिताम् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
रक्षिताः सत्यसन्धेन जिष्णुना रिपुजिष्णुना ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
रक्षितात्मा तु यो राजा रक्ष्यान्यश्चानुरक्षति |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
रक्षितान्धर्मराजेन जनकेन महात्मना ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
रक्षितारं न मृष्यन्ति भर्तारं परमं स्त्रिय़ः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षितारं शुभं वर्णा लेभिरे तं जनाधिपम् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
रक्षितास्तात भीष्मेण दिवसानि दशैव ह ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
रक्षितास्मीति चोक्तं ते प्रतिज्ञा चानृता तव |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
रक्षितौ वासुदेवेन स्वय़ं चास्त्रविशारदौ ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
रक्षित्वा च पुनरुपाध्याय़गृहमागम्योपाध्याय़स्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
रक्षित्वा चागम्य तथैवोपाध्याय़स्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षिभिश्च महात्मानं रक्ष्यमाणं समन्ततः ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
रक्षिभिश्चावहासं तं परितप्ये यथाग्निना ||
३५ ख