chevron_left  राजर्षिभिरदृश्यद्भिरृषिभिश्चarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
राजर्षिभिरदृश्यद्भिरृषिभिश्च महासुरौ |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
राजर्षिभिर्महाराज तथैव च द्विजर्षिभिः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
राजर्षिरधृतिः स्वर्गात्पतितो हि महाभिषः |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
कुरुरु उवाच
राजर्षिरप्यनिर्विण्णः कर्षत्येव वसुन्धराम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
राजर्षिवंशगोप्तारममरप्रतिमं नृपम् |
१८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
राजर्षिविषय़ाञ्ज्ञात्वा व्रह्मर्षिविषय़ांस्तथा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
राजर्षिषु निषण्णेषु महीय़ःसु महर्षिषु ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
राजर्षिस्तद्वनं प्राप्तस्तपस्वी होत्रवाहनः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षीणां च सर्वेषां चरितज्ञः सनातनः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
राजर्षीणां च सर्वेषां तत्त्वमप्यनुपालय़ ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
सृञ्जय़ उवाच
राजर्षीणां पुण्यकृतां महात्मनां; कीर्त्या युक्तां शोकनिर्णाशनार्थम् ||
१३८ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षीणां पुण्यकृतामाहवेष्वनिवर्तिनाम् |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षीणां पुराणानां धुरं धत्ते दुरुद्वहाम् |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षीणां पुराणानां भवतां वंशधारिणाम् |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
व्यास उवाच
राजर्षीणां पुराणानामनुय़ातु गतिं नृपः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
राजर्षीणां वृत्तमेतदवगच्छ युधिष्ठिर ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षीणां सुराणां च ये वसन्ति तपोधनाः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षीणां हि तं श्रुत्वा महिमानं महात्मनाम् |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
व्यास उवाच
राजर्षीणां हि सर्वेषामन्ते वनमुपाश्रय़ः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
राजर्षीणामुदाराणामाहवेष्वनिवर्तिनाम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ५२
ऋषय़ ऊचुः
राजर्षे किमभिप्रेतं येनेय़ं कृष्यते क्षितिः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
राजर्षे नातिहृष्टोऽसि कच्चित्क्षेमं तवानघ |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
राजर्षेस्तत्र च सरिन्नृगस्य भरतर्षभ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
राजर्षय़ः पुराणाश्च परमं दुःखभेषजम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षय़श्च दाशार्ह मानय़न्तस्तपस्विनः ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
राजर्षय़श्च निहता रुदन्त्यश्चाहृताः स्त्रिय़ः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षय़श्च प्रवरास्तथैव च दिवौकसः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
राजर्षय़श्च वहवः सर्वैः समुदिता गुणैः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
राजर्षय़श्च वहवस्तस्माद्वुध्यस्व पार्थिव |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षय़श्च वहवो दिलीपप्रमुखा नृपाः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
राजर्षय़ो जितस्वर्गा धर्मो ह्येषां निगद्यते ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
राजर्षय़ो महाय़ज्ञैर्हव्यकव्यैर्द्विजातय़ः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
राजलोका ह्यतिक्रान्ता यान्न सङ्ख्यातुमुत्सहे |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
राजवंशाश्च विविधा ऋषिवंशाश्च शाश्वताः |
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
धृतराष्ट्र उवाच
राजवद्राजसिंहस्य माद्र्याश्चैव विशेषतः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
देवय़ान्यु उवाच
राजवद्रूपवेषौ ते व्राह्मीं वाचं विभर्षि च |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
राजवल्लभतश्चैव नाश्रूय़न्त मृषा गिरः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
राजवृत्तं महाराज शृणुष्वावहितोऽखिलम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
राजवृत्तानि सर्वाणि राजैव युगमुच्यते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
युधिष्ठिर उवाच
राजवृत्तान्यनेकानि त्वय़ा प्रोक्तानि भारत |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
राजवृत्तेन सम्पन्नः प्रज्ञय़ाभिजनेन च |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
राजशास्त्रप्रणेतारो व्रह्मण्या व्रह्मवादिनः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
राजश्रिय़ा दीप्यमानो यय़ौ व्रह्मपुरःसरः |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
राजश्रिय़ाववद्धस्तु दुर्योधनवशानुगः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
राजश्रेष्ठं हय़श्रेष्ठाः सर्वतः पृष्ठतोऽन्वय़ुः |
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
राजसं तामसं चैव शुद्धात्माकर्मसम्भवम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
राजसत्कारमव्यग्रः शशंसास्मै वृहस्पतिः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
राजसांस्तामसांश्चैव नित्यं दोषान्विवर्जय़ेत् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
राजसानशुभान्गन्धांस्तामसांश्च तथाविधान् |
६० क