आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
राजा च तमृषिं श्रुत्वा निष्क्रम्य सह मन्त्रिभिः |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
राजा च धृतराष्ट्रः स शोकाकुलितचेतनः |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
राजा च धृतराष्ट्रस्तमुपासीनो महाभुजः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
राजा च धृतराष्ट्रोऽद्य श्रुत्वा पुत्रं मय़ा हतम् |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
राजा च धृतराष्ट्रोऽद्य श्रुत्वा पुत्रं मय़ा हतम् |
२५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
राजा च पाण्डवैः सार्धमिष्टे देशे सहानुगः |
२२ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
राजा च भीमसेनश्च सहदेवश्च पाण्डवः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
राजा च राज्ञः सचिवाश्च सर्वे; पुत्राश्च राज्ञः सुहृदस्तथैव |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
राजा च समुपाजह्रे तदन्नं सह भार्यया ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
राजा च हर्षमापेदे पाण्डवः ससुहृज्जनः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
राजा चतुर्थभाक्तस्य प्रजा धर्मेण पालय़न् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
राजा चरति चेद्धर्मं देवत्वाय़ैव कल्पते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
राजा चरति यं धर्मं व्राह्मणेन निदर्शितम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
राजा चरति वै धर्मं देवत्वाय़ैव गच्छति |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
राजा चित्ररथो नाम गन्धर्वो वासवानुगः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
राजा चेन्न भवेल्लोके पृथिव्यां दण्डधारकः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
राजा चैवं गुणो येषां कुशलं तेषु सर्वशः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
राजा जीवति कौरव्यो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
राजा ज्ञातिर्हतश्चाय़ं नैतन्न्याय़्यं तवानघ ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
राजा तस्याः परं दृष्ट्वा सौकुमार्यं वपुस्तथा |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
राजा तु धृतराष्ट्रोऽय़ं वय़ोवृद्धो न शाम्यति |
५ क
वन पर्व
अध्याय
६६
सुदेव उवाच
राजा तु नैषधो नाम वीरसेनसुतो नलः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
राजा तु पाण्डुरभवन्महात्मा लोकविश्रुतः ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
राजा तु पार्षतं विद्ध्वा शरैः पञ्चभिराय़सैः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
राजा तु मध्यमानीके कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
विदुर उवाच
राजा तु मां प्राहिणोत्त्वत्सकाशं; श्रुत्वा विद्वञ्श्रेय़ इहाचरस्व ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
राजा तु रक्षसाविष्टः सूदमाह गतव्यथः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
राजा तु वचनात्तस्य भृशं दुःखसमन्वितः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
युधिष्ठिर उवाच
राजा त्राता न लोके स्यात्किं तदा स्यात्पराय़णम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
राजा त्वमसि शाध्युर्वीं भृत्योऽहं परवांस्त्वय़ि ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
राजा दण्डधरो राजन्रक्षा नान्यत्र क्षत्रिय़ात् ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
राजा दम्भोद्भवो नाम सार्वभौमः पुराभवत् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
राजा दशरथश्चैव दिव्यभास्वरमूर्तिमान् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
राजा दुःशासनश्चैव कृपः शारद्वतस्तथा |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
राजा दुर्योधनो नाम धृतराष्ट्रसुतो वली |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
राजा दुर्योधनो नाम सखास्य भविता नृप |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
राजा देवानां नहुषो घोररूप; स्तत्र साह्यं दीय़तां मे भवद्भिः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
राजा द्रोणाय़ चोत्सृष्टः सैन्धवश्चानिपातितः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
राजा धर्मपरः सदा शुभगोप्ता; समीक्ष्य सुकृतिनां दधाति लोकान् |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्वाणपीडितः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
राजा निववृते कृष्णामादाय़ सपुरोहितः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
राजा परमधर्मात्मा लक्ष्मीवान्पाप उच्यते |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
राजा पाण्डुर्महारण्ये मृगव्यालनिषेविते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
राजा प्रगल्भं पुरुषं करोति; राजा कृशं वृंहय़ते मनुष्यम् |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
राजा प्रजानां हृदय़ं गरीय़ो; गतिः प्रतिष्ठा सुखमुत्तमं च |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
राजा प्रभङ्करो नाम कुले अस्मिन्वभूव ह |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
७७
यय़ातिरु उवाच
राजा प्रमाणं भूतानां स नश्येत मृषा वदन् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
राजा प्रशास्ति धर्मेण स्वकर्मनिरताः प्रजाः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
राजा प्रीतमनाः प्रीतं कृतकृत्यं मनीषिणम् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
राजा भगीरथो वृद्धो वृहत्क्षत्रश्च केकय़ः |
२८ क