शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
राज्ञः समीपान्निष्क्रान्तं शोकोपहतचेतसम् ||
८३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञः सर्वाय़ुधोपेतं स्त्रीणां चैव नरर्षभ ||
१० ग
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
राज्ञः स्नुषां राजभार्यां दमय़न्तीति विश्रुताम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
राज्ञश्च दर्शय़ामासुः शरीरं राजधर्मणः |
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
राज्ञश्च धृतराष्ट्रस्य तथा त्वमपि चात्मनः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञश्च धृतराष्ट्रस्य द्रोणस्य च महात्मनः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
राज्ञश्च राजपुत्रांश्च पाण्डवेनाभि संस्थितान् ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
राज्ञश्च राजपुत्रांश्च सोदर्यांश्च विशेषतः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
राज्ञश्च हि प्रिय़मेतच्छृणोमि; मन्ये चैतत्पाण्डवानां समर्थम् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
राज्ञश्चान्यान्रणे शूरान्वहूनार्छद्धनञ्जय़ः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
राज्ञश्चापि सभार्यस्य धैर्यं पश्यत यादृशम् ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
राज्ञश्चैव समावृत्तान्पार्थिवान्पृथिवीपते ||
११ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञश्चैवापि तान्सर्वान्सुविभक्तान्सुपूजितान् |
३५ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञस्ततः समाचख्यौ मन्त्री विजय़मुत्तमम् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
राज्ञस्तथा हीममधर्ममुग्रं; न लक्षय़न्ते कुरुवृद्धमुख्याः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६८
भीष्म उवाच
राज्ञस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रीतिमानभवद्द्विजः |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञस्तु चित्तं रक्षन्तौ नोचतुः किञ्चिदप्रिय़म् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
राज्ञस्तु मतमाज्ञाय़ समनह्यत सा चमूः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञस्तु याजकैस्तत्र कृतो वेदीपरिस्तरः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा कृपः शारद्वतस्ततः |
४० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा देवराजः पुरन्दरः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं हितम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा धृतराष्ट्रस्य सञ्जय़ः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा विदुरो दीर्घदर्शिनीम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
राज्ञस्ते वचनाद्राजन्पाञ्चालाः सोमकास्तथा |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
राज्ञस्त्रिवर्गवेत्तारं पौरजानपदप्रिय़म् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
राज्ञस्त्वनन्तरं राजा पाञ्चाल्यो द्रुपदोऽभवत् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञस्त्वन्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य केशव |
६३ क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
अर्जुन उवाच
राज्ञा कल्माषपादेन गुरौ व्रह्मविदां वरे |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञा चाद्भुतवीर्येण योधैश्च समरप्रिय़ैः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
राज्ञा जेतव्याः साय़ुधाश्चोन्नताश्च; सम्यक्कर्तव्यं पालनं च प्रजानाम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञा दक्षिणपाञ्चालान्द्रुपदेनाभिरक्षितान् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञा दत्ताथ दाशाय़ इय़ं तव भवत्विति |
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
राज्ञा परिक्षिता कोपादशपं तमहं नृपम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
३७
कृश उवाच
राज्ञा परिक्षिता तात मृगय़ां परिधावता |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञा पुत्रफलं देय़मिति मे निश्चिता मतिः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
राज्ञा पुरोहितः कार्यो भवेद्विद्वान्वहुश्रुतः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञा पृष्टः स कुशलं सुखासीनश्च सञ्जय़ः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञा मूर्धन्युपाघ्रातास्ते च कौरवनन्दनाः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञा मूर्धन्युपाघ्रातो भीमेन च महाभुजः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
राज्ञा यदुक्तं भग्नेन तस्मिन्व्यसन आगते ||
३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
राज्ञा राजसुतैश्चापि गर्भिण्या चैव योषिता ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
राज्ञा राजैव योद्धव्यस्तथा धर्मो विधीय़ते |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ञा वसुमता सार्धमष्टकेन च वीर्यवान् |
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
राज्ञा वा समनुज्ञातः कामं कुर्वीत धार्मिकः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
४९
सूत उवाच
राज्ञा वासुकिना सार्धं स शापो न भवेदिति ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
राज्ञा व्यूढेष्वनीकेषु श्रोतव्यं जय़मिच्छता ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
राज्ञा सप्तैव रक्ष्याणि तानि चापि निवोध मे |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
राज्ञा हि पूजितो धर्मस्ततः सर्वत्र पूज्यते |
४ क