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उद्योग पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
वाणस्य भौमस्य च कर्ण हन्ता; किरीटिनं रक्षति वासुदेवः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
वाणान्धकारं सहसैव कृत्वा; जघान नागाश्वरथान्नरांश्च ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
वाणान्धकारं सहसैव कृत्वा; विव्याध सर्वानिषुभिः सुपुङ्खैः ||
६३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
वाणान्धकारमभवत्तय़ो राजन्महाहवे |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
वाणान्धकारे महति कृते गाण्डीवधन्वना ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
वाणान्धकारे महति कृते तत्र महाभय़े ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
वाणाभिघातात्सञ्जज्ञे तत्र भारत पावकः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
वाणाश्च मे तूणमुखाद्विसृज्य; मुहुर्मुहुर्गन्तुमुशन्ति चैव ||
९६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
वाणाहतास्तूर्णमपेतसत्त्वा; विष्टभ्य गात्राणि निपेतुरुर्व्याम् |
१२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
वाणिज्यं पाशुपाल्यं च तथा शिल्पोपजीवनम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
वाणिज्यं सत्पथस्थानमातिथ्यं प्रशमो दमः |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
वाणी सम्पद्यतामेषा कर्मणा मा चिरं कृथाः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
वाणीवादाञ्छुकांश्चापि शारिकाभृङ्गराजकान् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
धृतराष्ट्र उवाच
वाणे तस्मिन्निकृत्ते तु धृष्टद्युम्ने च मोक्षिते |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
वाणेन वाणेन महारथानां; चिच्छेद चापानि रणे प्रसह्य ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
वाणैः सुमुक्तैरतितीव्रवेगै; र्यैराहतो मृत्युरपि व्यथेत ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
वाणैरुन्मथ्य विधिवद्व्राह्मणेभ्यो न्यवेदय़त् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
वाणैरेवाच्छिनत्तूर्णमेकैकं त्रिभिराहवे ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८२
भीष्म उवाच
वाणैर्दिव्यैर्जामदग्न्यस्य सङ्ख्ये; दिव्यांश्चाश्वानभ्यवर्षं ससूतान् ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
वाणैर्भिन्नतनुत्राणं धृष्टद्युम्नेन केशव |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
वाणैर्विध्वंसय़ामास गिरेः शृङ्गं सहस्रधा ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
वाणैस्त्वरावाञ्ज्वलिताग्निकल्पै; र्विद्ध्वा प्रादान्मृत्यवे साश्वसूतम् ||
६५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
वाणो नामाथ दैतेय़ो वलेः पुत्रो महावलः |
७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कर्ण उवाच
वाणौघैः शकलीकृत्य तव दास्यामि मेदिनीम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
वातं च ष्ठीवनं चैव कुर्वते चास्य संनिधौ |
५३ क
वन पर्व
अध्याय १०९
लोमश उवाच
वातं चाहूय़ मा शव्दमित्युवाच स तापसः |
९ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
वातं तमेवाभिमुखो यतस्तत्पुष्पमागतम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
वातं वृक्षानिव वलात्प्रभञ्जन्तं रणे नृपान् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
वातपित्तकफान्रक्तं त्वङ्मांसं स्नाय़ुमस्थि च |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
व्यास उवाच
वातप्रधानेन मय़ा स्वचित्तवशवर्तिना |
८ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
वातरुग्ण इव क्षुण्णो जीर्णमूलो वनस्पतिः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७८
वसिष्ठ उवाच
वातरेणुसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
वातवर्षं महच्चासीन्न चागच्छति मे प्रिय़ा |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
वातवेगप्रचलिता अष्ठीला शाल्मलेरिव ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
वातवेगो दिशाचक्षुर्निमेषो निमिषस्तथा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
वातसारथिराधत्ते गर्भं सुषुवतुश्च तम् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
वातस्कन्धो विशाखश्च विधाता काल एव च |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
वातातपविशीर्णाङ्गीं त्वां विवर्णां निरीक्ष्य वै |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
वाताधिक्यं भवत्येव तस्माद्धि न समाचरेत् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
वातापिं संस्कृतं दृष्ट्वा मेषभूतं महासुरम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
वातापिः प्रहसन्राजन्निश्चक्राम विशां पते ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
वातापिः शत्रुतपनः शठश्चैव महासुरः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
श्रीवासुदेव उवाच
वातापिरिल्वलश्चैव त्रिशिराश्च तथा विभो |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
वातापिश्च यथा नीतः क्षय़ं स व्रह्महा प्रभो |
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
वाताय़नविमानेषु तथा गर्भगृहेषु च ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
वाताय़माना दृश्यन्ते गन्धर्वनगरोपमाः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
वाताय़मानानद्राक्षं शतशोऽथ सहस्रशः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
वाताय़मानान्पश्याम ह्रिय़माणान्विशां पते ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
वाताय़मानैरथ तैरश्वैरपहृतो रणात् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
वाताय़मानैरसकृद्धतवीरैरलङ्कृतैः |
४४ क