द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
रक्षिष्यमाणान्सङ्ग्रामे द्रोणं व्यधमदच्युतः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
रक्षेत्युक्तश्च यो हिंस्यात्सर्वे व्रह्महणैः समाः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षेमां पृथिवीं सर्वां मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गताम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
रक्षेरन्को नु तां युध्येच्चमूमन्यत्र कौरवैः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६७
गन्धर्व उवाच
रक्षो अत्तुमिह ह्यावां नूनमेतच्चिकीर्षति ||
२१ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
रक्षो यक्षाञ्शुको मर्त्यान्वैशम्पाय़न एव तु ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
रक्षोगणा भूतगणाश्च द्रौणि; मपूजय़न्नप्सरसः सुराश्च ||
१३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे; महर्षय़श्चैव तथा प्रणेमुः ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
रक्षोगणा भूतगणाश्च सर्वे; महर्षय़श्चैव सदा स्तुवन्ति ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
रक्षोगणान्नर्दतश्चाभिवीक्ष्य; नरेन्द्रय़ोधा व्यथिता वभूवुः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
रक्षोगणावकीर्णानि तीर्थान्येतानि भारत |
१०० क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षोघ्नांश्च तथा मन्त्राञ्जेपुश्चक्रुश्च ते क्रिय़ाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
रक्षोघ्नैर्विविधैर्मन्त्रैर्धौम्यः सम्यक्प्रय़ोजितैः |
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
रक्षोभिर्वध्यमानेषु दृश्यद्रव्येषु कर्मसु |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
रक्षोभिश्च पिशाचैश्च रौद्रैर्भूतगणैस्तथा |
११ ख
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
रक्षोभ्यो रक्षितव्यश्च दुर्गेषु विषमेषु च ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
रक्षोवलसमाविष्टो विसञ्ज्ञश्चाभवत्तदा ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
रक्ष्यतां सौहृदं तस्मादन्योन्यप्रतिभाविकम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९६
नारद उवाच
रक्ष्यते दैवतैर्नित्यं यतस्तद्गाण्डिवं धनुः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
रक्ष्यते यश्च सङ्ग्रामे ये च सञ्जय़ रक्षिणः |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
रक्ष्यन्ते ते कुवेरस्य सहाय़ैरुद्यताय़ुधैः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
रक्ष्यमाणं तथा द्रोणं समरे तैर्महात्मभिः |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
रक्ष्यमाणः कथं वीरैर्गोप्यमानाश्च तेन ते |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
रक्ष्यमाणः प्रय़त्नेन तत्रैवान्तरधीय़त ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
रक्ष्यमाणः सुसंरव्धैः पुत्रैः शस्त्रभृतां वरः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
रक्ष्यमाणश्च तैः शूरैर्गोप्यमानाश्च तेन ते |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
रक्ष्यमाणश्च तैर्विप्रैर्नाहं भूमिमुपास्पृशम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
रक्ष्यमाणश्च वलिभिश्छादय़ामास सात्यकिम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
रक्ष्यमाणा वय़ं तात राजभिः शास्त्रदृष्टिभिः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
११०
वैशम्पाय़न उवाच
रक्ष्यमाणो महाभूतैः सिद्धैश्च परमर्षिभिः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
रक्ष्यमाणो महावीर्यैः सहितैर्मद्रकेकय़ैः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
रक्ष्यमाणो मय़ा नित्यं वीरः सततमात्मवान् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
रक्ष्यमाणो मय़ा राजन्भीमसेनवलेन च ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
रक्ष्यमाणो हि समरे भीष्मोऽस्माकं पितामहः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
पर्वत उवाच
रक्ष्यश्च देवराजात्स देवराजसमद्युतिः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
रक्ष्यसे तेन दुर्वुद्धे नात्मवीर्याद्द्रुमाधम ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
रक्ष्या मे सततं देवाः सहेन्द्राः सद्विजातय़ः |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
रक्ष्याण्येतानि देवानां गूढमाय़ा हि देवताः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
रक्ष्याश्च ते पाण्डवेय़ा भवान्ह्येषां पराय़णम् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
रक्ष्यास्तद्वन्ममापीह यूय़ं सर्वे युधिष्ठिर ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
रक्षय़ा तच्छतगुणं धर्मं प्राप्नोति पार्थिवः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
रक्षय़ा स हि तेषां वै महत्सुखमवाप्नुय़ात् ||
२२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
रघुर्नरवरश्चैव तथा दशरथो नृपः ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
रङ्गभूमौ सुविपुलं शास्त्रदृष्टं यथाविधि |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
रङ्गमध्यं तदाचार्यः सपुत्रः प्रविवेश ह |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
रङ्गमध्यगतस्तत्र मेघगम्भीरय़ा गिरा |
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
रङ्गस्यैवं मतिरभूत्क्षणेन वसुधाधिप |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
रङ्गान्निरक्रामदचिन्त्यकर्मा; पत्न्या तय़ा चाप्यनुगम्यमानः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
रङ्गावतरणं चैव तथा रूपोपजीवनम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
रङ्गावतीर्णा द्रुपदात्मजार्थं; द्वेष्यान्हि चक्रुः सुहृदोऽपि तत्र ||
५ ख