chevron_left  राज्यमात्माarrow_drop_down
सभा पर्व
अध्याय ६१
भीम उवाच
राज्यमात्मा वय़ं चैव कैतवेन हृतं परैः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१
देवस्थान उवाच
राज्यमेके प्रशंसन्ति सर्वेषां परिपालनम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यमेव परं धर्मं क्षत्रिय़स्य विदुर्वुधाः ||
१३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
राज्यलुव्धः पुनः कर्ण समाह्वय़सि पाण्डवम् |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यश्रिय़ं परित्यज्य वनवासमरोचय़त् ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यस्थय़ा तपस्तप्तं दानं दत्तं व्रतं कृतम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
राज्यस्य दण्ड एवाङ्गं दण्डः प्रभव एव च ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यस्य पदवीं धर्म्यां व्रज सत्पुरुषोचिताम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
राज्यस्यार्धं दीय़तां पाण्डवाना; मिन्द्रप्रस्थं धर्मराजोऽनुशास्तु |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
राज्यहेतोर्विवदिताः कश्यपस्य सुरासुराः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
राज्यांशं प्रतिदत्त्वा च सौभ्रात्रं कर्तुमिच्छसि ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यांशश्चाभ्यनुज्ञातो यो मे पित्रा पुराभवत् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
युधिष्ठिर उवाच
राज्यात्प्रच्यवमानस्य गतिमन्यामपश्यतः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
व्यास उवाच
राज्यात्स्फीतात्परिभ्रष्टस्तपसा तदवाप्स्यसि ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
राज्याद्देवत्वमिच्छन्ति देवत्वादिन्द्रतामपि ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
पुत्र उवाच
राज्याद्भावो निवृत्तो मे त्रिदिवादिव दुष्कृतेः ||
२० ग
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
राज्याद्विनिकृतोऽस्माभिः कथं सोऽस्मासु विश्वसेत् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
राज्याधिकारे राजेन्द्र वृहस्पतिमतः पुरा ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
राज्यानि हित्वा विपुलांश्च भोगा; न्गतान्नरेन्द्रान्वशमन्तकस्य ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
राज्यान्निवर्तनं चैव व्रह्मचर्यव्रते स्थितिः ||
७९ ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
राज्यार्थे द्यूतसम्भूतो वनवासस्तथैव च ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
राज्यार्थे पाण्डवेय़ानां तावदेवाशु विक्रम ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
राज्यार्धं पञ्च वा ग्रामान्नाकार्षीत्स च दुर्मतिः ||
८ ग
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
राज्याशां विपुलां राजन्पाण्डवेषु च दुष्कृतम् ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
राज्ये चैवाभिषिच्यस्व भारताननुशाधि च |
११ क
वन पर्व
अध्याय १९०
मार्कण्डेय़ उवाच
राज्ये तदा तत्र गत्वा स विप्रः; प्रोवाचेदं वचनं वामदेवः |
७० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
राज्ये तान्स्थापय़ित्वाग्रे नोपेक्षीर्विनशिष्यतः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
राज्ये निवेशय़ामास विधेय़ं नृपसत्तमः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
राज्ये स्थितो धृतराष्ट्रो मनीषी; तस्यानुजो विदुरो दीर्घदर्शी |
३० क
वन पर्व
अध्याय ६३
वृहदश्व उवाच
राज्येन तनय़ाभ्यां च सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
२१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
राज्येन राजानमजातशत्रुं; सम्पादय़िष्याम्यहमद्य हृष्टः ||
८५ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
राज्येन राष्ट्रैश्च निमन्त्र्यमाणाः; पित्रा च कृष्णे तव सोदरैश्च |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
राज्येनामात्यसंस्थेन कथं राजन्प्रमाद्यसि ||
६४ ख
आदि पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
राज्येऽभिषिच्य मुदितः प्रवव्राज वनं तदा ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
राज्येऽभिषिच्य मुदितो वानप्रस्थोऽभवन्मुनिः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
राज्येऽसति कुतो धर्मो धर्मेऽसति कुतः परम् ||
१५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
राज्यैकदेशमपि नः प्रय़च्छ शममिच्छताम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
राज्यैश्वर्यमय़ः पाशः स्नेहाय़तनवन्धनः |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
राजय़ाजकय़ाज्यानां मद्रकाणां च यन्मलम् |
७१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
राजय़ाजकय़ाज्येन नष्टं दत्तं हविर्भवेत् |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
राजय़ुक्तापचारांश्च सर्वान्वुद्ध्वा ततस्ततः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
रात्रावपि हि योत्स्यन्ते संरव्धाः कुरुसृञ्जय़ाः ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
रात्रावहनि सन्धौ च कस्य कॢप्तः परिग्रहः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
रात्रावहनि सन्ध्यासु चत्वरेषु सभासु च |
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
रात्रिः समभवच्चैव तीव्ररूपा भय़ावहा ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
रात्रिः समभवद्घोरा नापश्याम ततो रणम् ||
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
रात्रिः स्वप्नाय़ भूतानां चेष्टाय़ै कर्मणामहः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
रात्रिजागरणश्रान्ताः सौद्युम्निः समतीत्य तान् ||
११ ख