सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
रात्रिञ्चराणां सत्त्वानां निनादोऽभूत्सुदारुणः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
रात्रिमेतावतीं चास्य प्राहुरध्यात्मचिन्तकाः ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
रात्रिरेतावती चास्य प्रतिवुद्धो नराधिप |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
रात्रिशेषं तदत्युग्रं धारय़ामासतुर्हृदा ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
युधिष्ठिर उवाच
रात्रिशेषे व्यतिक्रान्ते प्रय़ास्यामो रणाजिरम् |
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
रात्रिश्च भरतश्रेष्ठ योधानां युद्धशालिनाम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
रात्रिश्च भरतश्रेष्ठ सुखशीतोष्णमारुता ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
रात्रिश्चैतावती राजन्यस्यान्ते प्रतिवुध्यते ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
रात्रिस्तावत्तिथी व्राह्मी तदादौ विश्वमीश्वरः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
रात्रिय़ुद्धे तदा घोरे वर्तमाने सुदारुणे |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
रात्रिय़ुद्धे तदा राजन्वर्तमाने सुदारुणे |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
रात्रौ कुरुकुलश्रेष्ठ मन्त्रोऽय़ं समजाय़त ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
रात्रौ दधि च सक्तूंश्च नित्यमेव व्यवर्जय़न् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
रात्रौ निर्यास्यति क्रोधादिति मत्वा व्यवस्थिताः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
रात्रौ निशीथे स्वाभीले गतेऽर्धसमय़े नृप |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
रात्रौ परासुमुत्सृज्य निश्चक्रमुररिन्दमाः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
रात्रौ रात्रौ भवत्येषा नित्यमेव समर्थना ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
रात्रौ वंशवनस्येव दह्यमानस्य पर्वते |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
रात्रौ हि राक्षसा भूय़ो भवन्त्यमितविक्रमाः |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
रात्र्यहःश्रोत्रनय़नः पक्षमासशिरोभुजः |
५० क
स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
रात्र्यहानि तु तान्याहुर्भूतानां परिचिन्तकाः |
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
रात्र्या यय़ा चाभिजिताश्च लोका; भवन्ति कामा विजिताः सुखाश्च |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
रात्र्यां रात्र्यां व्यतीताय़ामाय़ुरल्पतरं यदा |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
रात्र्यागमे प्रलीय़न्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
रात्र्यागमे महीपालाः स्वानि वेश्मानि भेजिरे ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
राद्धापराद्धे जानाति यः स मध्यमपूरुषः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
राधा नाम महाभागा न सा पुत्रमविन्दत |
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
राधाय़ाश्चैव मां प्रादात्सौहार्दान्मधुसूदन ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
शल्य उवाच
राधेय़ गाण्डिवस्याजौ तदा नैवं वदिष्यसि ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९३
धृतराष्ट्र उवाच
राधेय़ मन्यसे त्वं च यत्प्राप्तं तद्व्रवीहि मे ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
राधेय़ं तु रणे दृष्ट्वा पदातिनमवस्थितम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
राधेय़ं निर्जितं दृष्ट्वा तावका भरतर्षभ |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
राधेय़ं निहतं मत्वा समुत्तस्थौ युधिष्ठिरः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
राधेय़ं पूजय़न्तश्च प्रशंसन्तश्च निर्ययुः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
राधेय़ं भीषय़ित्वा च सौवलं च पुनः पुनः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
राधेय़ं हितमस्माकं सूतपुत्रं तनुत्यजम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
राधेय़ः कर्ण इति मां प्रवदन्ति जना भुवि |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
राधेय़ः पाण्डवश्रेष्ठं शक्तः पीडय़ितुं रणे |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
राधेय़ः शकुनिश्चापि निहतास्तव शत्रवः ||
४१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
राधेय़चापनिर्मुक्तैः शरैः काञ्चनभूषितैः |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
वैशम्पाय़न उवाच
राधेय़मभिसम्प्रेक्ष्य जहास स्वनवत्तदा ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
राधेय़स्य वचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
राधेय़स्य वचः श्रुत्वा राजा दुर्योधनस्तदा |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
राधेय़स्याच्छिनद्भल्लैः कार्मुकं चित्रय़ोधिनः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
राधेय़स्याद्य पापस्य भूमिः पास्यति शोणितम् |
११२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
राधेय़ाः सूतपुत्राश्च भ्रातरश्च महारथाः |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
राधेय़ात्परिरक्षन्तो राजानं पर्यवारय़न् ||
८१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
राधेय़ानामधिरथः कर्णः किमकरोद्युधि ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
राधेय़े च विकर्णे च नैवाशाम्यत वैशसम् ||
२३ ख