शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
रामो दाशरथिर्भूत्वा भविष्यामि जगत्पतिः ||
७८ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
रामो दाशरथिश्चैव लक्ष्मणोऽथ प्रतर्दनः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
रामो राक्षसहा वीरः शशविन्दुर्भगीरथः |
४४ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
रामो वनान्ते प्रतिपालय़न्मा; मास्तेऽद्याहं तेन समागमिष्ये ||
७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
रामो वाप्यनिरुद्धो वा प्रद्युम्नो वा महारथः ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
रामो विरामो विरतो मार्गो नेय़ो नय़ोऽनय़ः |
५६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
समुद्र उवाच
रामोऽपि धनुरादाय़ रथमारुह्य सत्वरः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणं पुरतो यान्तमन्वगच्छत्सुदुःखितः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५८
युधिष्ठिर उवाच
रावणः कस्य वा पुत्रः किं वैरं तस्य तेन ह ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणः कामवाणार्तो ददर्शोपससर्प च ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणः शोकमोहार्तो वैदेहीं हन्तुमुद्यतः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणश्च विधिं चक्रे लङ्काय़ां शास्त्रनिर्मितम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणस्तु यतिर्भूत्वा मुण्डः कुण्डी त्रिदण्डधृक् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२५८
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणस्यापि ते जन्म व्याख्यास्यामि जनेश्वर ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
रावणान्तकरं घोरं व्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणिस्तु यदा नैनं विशेषय़ति साय़कैः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०७
सुपर्ण उवाच
रावणेन तपश्चीर्त्वा सुरेभ्योऽमरता वृता ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
रावणेन समप्राणा व्रह्मय़ज्ञविनाशनाः ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणेन हृता सीता राज्ञा लङ्कानिवासिना |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२६९
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणो राममानर्छच्छक्तिशूलासिवृष्टिभिः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणो विदितो मह्यं लङ्का चास्य महापुरी ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
रावणोऽपि पुरीं गत्वा लङ्कां कामवलात्कृतः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
मार्कण्डेय़ उवाच
रावय़ामास लोकान्यत्तस्माद्रावण उच्यते |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
राशिवर्धनमात्रं स नैव स्त्री न पुनः पुमान् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
राशिवर्धनमात्रास्ते नैव ते प्रेत्य नो इह ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
राशय़ः सम्प्रदृश्यन्ते गिरिमात्रास्ततस्ततः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
राशय़श्चात्र दृश्यन्ते विनिकीर्णा रणक्षितौ ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
राशय़ो निपतन्ति स्म वाय़ुश्च सुसुखो ववौ ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
राष्ट्रं च कोशभूतं स्यात्कोशो वेश्मगतस्तथा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
राष्ट्रं च पीडय़ेत्तस्य शस्त्राग्निविषमूर्छनैः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
राष्ट्रं च येऽनुजीवन्ति ये च राज्ञोऽनुजीविनः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
राष्ट्रं च रञ्जय़ामास वृत्तेन भरतर्षभ ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
राष्ट्रं तवानुशासन्ति मन्त्रिणो भरतर्षभ ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
राष्ट्रं तस्याभिय़ात्वाशु वहुधान्यसमाकुलम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
राष्ट्रं रक्षन्वुद्धिपूर्वं नय़ेन; सन्त्यक्तात्मा यज्ञशीलो महात्मा |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
मातो उवाच
राष्ट्रं वलममात्याश्च पृथक्कुर्वन्ति ते मतिम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
राष्ट्रगुप्तिं च ते सम्यग्राष्ट्रस्यैव च सङ्ग्रहम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
युधिष्ठिर उवाच
राष्ट्रगुप्तिं च मे राजन्राष्ट्रस्यैव च सङ्ग्रहम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
राष्ट्रमप्यतिदुग्धं हि न कर्म कुरुते महत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
युधिष्ठिर उवाच
राष्ट्रस्य यत्कृत्यतमं तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
राष्ट्रस्यारक्ष्यमाणस्य कुतो भूतिः कुतः सुखम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
राष्ट्रस्यैतत्कृत्यतमं राज्ञ एवाभिषेचनम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
राष्ट्राणां स्फीतरत्नानां हरणं च तवात्मजैः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
राष्ट्राणि धनधान्यं च प्रय़ुक्तः परमोपधिः ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
राष्ट्रात्प्रव्राजनं क्लेशं वनवासं च पाण्डव |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
राष्ट्रादपेत्य वसतो धार्मस्ते नावसीदति ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
जनमेजय़ उवाच
राष्ट्रे किं चक्रतुर्वीरौ वासुदेवधनञ्जय़ौ ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
राष्ट्रे चरन्ति यं धर्मं राज्ञा साध्वभिरक्षिताः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
राष्ट्रे धर्मोत्तरे श्रेष्ठे विदर्भेष्वभवद्द्विजः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
राष्ट्रे वभूवतुर्हृष्टौ वासुदेवधनञ्जय़ौ ||
२ ख