शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
राष्ट्रे स्वपति जागर्मि मामकान्तरमाविशः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
राष्ट्रेण राजा व्यसने परिरक्ष्यस्तथा भवेत् ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
रासभारावसदृशं रुराव च ननाद च ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
रासभारुणसङ्काशा धनुष्मन्तः सविद्युतः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
राहुग्रस्तस्य सोमस्य यथा ज्योत्स्ना न भासते |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
राहुरग्रसदादित्यं युगपत्सोममेव च ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशां पते |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
राहुर्यथा चन्द्रमुपैति चापि; तथावुधं पापमुपैति कर्म ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
राहुर्विवुधरूपेण दानवः प्रापिवत्तदा ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
राहुश्चाग्रसदादित्यमपर्वणि विशां पते |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
रित्थाहुत्थौ वीरताम्रौ वराहाश्वो रुचिः प्रभुः |
५२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
रिपवः पात्यमाना वै ये सहेय़ुर्महाशरान् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
रिपुं निहत्याभिननन्द वै तदा; अलम्वुसं पक्वमलम्वुसं यथा ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
रिपुर्द्वेष्टा दुर्वलो वा वली वा; तस्माच्छत्रौ नैव हेडेद्यतात्मा ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
रिपुष्वपि दय़ावांश्च तस्मात्कर्णो वृषा स्मृतः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
रिपूणां शिरसि स्थित्वा तथा विक्रम्य चोरसि |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
रिपूणामनवज्ञानं नित्यं चानार्यवर्जनम् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
रिपून्भार्गव देवानां जहि सर्वान्समागतान् |
१४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
रिपून्हन्तास्मि समरे ये वो वधचिकीर्षवः ||
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
रिपोरभ्यर्दय़न्नागमुन्मदः पाण्डवः शरैः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
रिपौ मित्रेऽथ मध्यस्थे विजय़े सन्धिविग्रहे |
१२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
रिरक्षिषन्तः पाञ्चाल्यं धृष्टद्युम्नमुखन्रणे ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
रिरक्षिषन्तः संरम्भं गमिष्यन्तीति मे मतिः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
रिरक्षिषुः सुसंय़त्तो धार्तराष्ट्रोऽभिवर्तते ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
रुक्मं चापि महामेरुः स्वय़ं कनकपर्वतः ||
१२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
रुक्मं हिरण्यं वासांसि यानं युग्यमजाविकम् |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मदण्डं वृहन्मूर्ध्नि दुधावाभिप्रदक्षिणम् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
रुक्मदण्डां महाशक्तिं जग्राहाग्निशिखोपमाम् |
६० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
रुक्मदण्डां महाशक्तिं प्रेषितां सौमदत्तिना |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
रुक्मध्वजवरः शूरो मेरुशृङ्ग इवावभौ ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
रुक्मध्वजो रुक्मपृष्ठं महद्विस्फार्य कार्मुकम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपक्षान्तरे सक्तस्तस्मिंश्चर्मणि भास्वरे |
६७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खा व्यराजन्त हंसाः श्रेणीकृता इव ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मपुङ्खाः प्रसन्नाग्रा मुक्ता हस्तवता त्वय़ा |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खाः प्रसन्नाग्राः सर्वकाय़ावदारणाः |
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
रुक्मपुङ्खाः सुतीक्ष्णाग्रा मुक्ता हस्तवता मय़ा |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खाञ्शरानस्यन्युय़ुधानमुपाद्रवत् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खान्प्रसन्नाग्राञ्शरान्संनतपर्वणः |
९८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खैः प्रसन्नाग्रैस्तव पुत्रेण धन्विना |
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खैः शरैश्छन्नाश्चित्ररूपा वभुस्तदा ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खैः सुनिशितैर्गार्ध्रपत्रैरजिह्मगैः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खैरजिह्माग्रैः शरैश्छिन्नतनुच्छदौ |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खैर्महावेगैराकर्णसमचोदितैः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खैर्महेष्वासः कृतहस्तो महावलः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खैर्महेष्वासः स विद्धो व्यपय़ाद्रणात् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खैर्महेष्वासो गार्ध्रपत्रैरजिह्मगैः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खैश्च सम्पूर्णा रुधिरौघपरिप्लुता |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपुङ्खैस्तैलधौतैः कर्मारपरिमार्जितैः ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मपृष्ठं धनुः खड्गं तूणांश्चापि परामृशत् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मपृष्ठं धनुर्गृह्य शरांश्चाशीविषोपमान् |
१५ क