द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपृष्ठं महच्चापं भीमस्यासीद्विशां पते |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपृष्ठं महावेगं रुक्मचन्द्रकसङ्कुलम् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मपृष्ठानि चापानि व्यतिषक्तानि धन्विनाम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपृष्ठावकीर्णास्तु कौशेय़सदृशा हय़ाः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
रुक्मपृष्ठैश्च दुष्प्रेक्ष्यैः कार्मुकैः पृथिवीपते |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
रुक्ममश्वांश्च ददतो रजतं स्यन्दनांस्तथा |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
रुक्ममालाधराः शूरा हेमवर्णाः स्वलङ्कृताः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
रुक्मवर्णकरः शूरस्तपनीय़ाङ्गदः शुचिः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
रुक्मवेदिनिभास्तास्तु चन्द्रलेखा इवामलाः |
४३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मवेदीनिभां पश्य कृष्ण लक्ष्मणमातरम् ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मस्य योषितां चैव धर्मराजः पृथग्ददौ ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्माङ्गदधरं वीरं भीमं भीमपराक्रमम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
रुक्माङ्गदशिरस्त्राणो रुक्मवर्मसमावृतः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
रुक्माङ्गदान्रुक्मपुङ्खैर्विद्ध्वा प्राय़ादमित्रहा ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
रुक्माङ्गदी रुक्मवर्मा रुक्मपुङ्खानवाकिरत् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
रुक्माङ्गदेन वीरेण तथा रुक्मरथेन च ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
रुक्माङ्गदो रुक्मपुङ्खैः पार्थो निन्ये यमक्षय़म् ||
५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मिणी त्वथ गान्धारी शैव्या हैमवतीत्यपि |
७१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
रुक्मिणी देवकीपुत्रसंनिधौ पर्यपृच्छत ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
रुक्मिणीं चाव्रवीत्प्रीतः सर्वस्त्रीणां वरं यशः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मिण्या हरणं वीरो वासुदेवेन धीमता ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मिण्यामस्य मूढस्य प्रार्थनासीन्मुमूर्षतः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मी च नृपशार्दूलो राजा च जनमेजय़ः ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मी तु विजय़ं लव्ध्वा धनुर्मेघसमस्वनम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
रुचिं च रुचिरापाङ्गीं पीनश्रोणिपय़ोधराम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
रुचितं हि ममैतत्ते द्वारकागमनं प्रभो |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
रुचिते तव वार्ष्णेय़ मन्त्रं पृच्छाम कौरवम् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
रुचिते वर्तते धर्मो न वलात्सम्प्रवर्तते ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
रुचिरमुकुटकुण्डलैर्मही; पुरुषशिरोभिरवस्तृता वभौ ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३९
उत्तर उवाच
रुचिराणि प्रकाशन्ते पार्थानामाशुकारिणाम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
रुचिरैरासनैः स्तीर्णां काञ्चनैर्दारवैरपि |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
रुच्या भगिन्या दानं वै वभूव धनधान्यवत् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
रुजन्ति हि शरीराणि रोगाः शारीरमानसाः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
शल्मलिरु उवाच
रुजन्द्रुमान्पर्वतांश्च यच्चान्यदपि किञ्चन ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
माण्डव्य उवाच
रुजा शूलकृता चैव न ते विप्र भविष्यति |
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
रुतज्ञा सर्वभूतानां यथा वै जीवजीवकः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
रुदतां वाहनानां च नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् |
४८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
रुदती पाण्डवं कृष्णा सहभ्रातरमव्रवीत् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
रुदती पुत्रशोकार्ता निशीथे कमलेक्षणा |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
रुदती मन्दय़ा वाचा पुत्रान्वचनमव्रवीत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
रुदती रुधिरार्द्राङ्गी व्याघ्रेण परिरक्षिता |
७० क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
रुदतीं राम रामेति ह्रिय़माणां तपस्विनीम् ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
६
सूत उवाच
रुदतीं वाष्पपूर्णाक्षीं भृगोर्भार्यामनिन्दिताम् |
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
रुदतीमथ पाञ्चालीं ददर्श पतितां भुवि ||
१२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
रुदतीमपहाय़ैनामुपगच्छाम यद्वनम् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
रुदन्तः शोकसन्तप्ता अनुजग्मुर्नराधिपम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
रुदन्तस्तेऽथ शर्मिष्ठामभ्ययुर्वालकास्ततः ||
१६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
रुदन्ति दीनास्तुरगा मातङ्गाश्च सहस्रशः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
रुदन्तीं च स्नुषां दृष्ट्वा भार्यामार्तां परावसोः |
६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
रुदन्त्यः पर्युपासन्ते मद्रराजकुलस्त्रिय़ः ||
६ ख