वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
रुदन्त्यो दीनकण्ठ्यस्ता विनदन्त्यो हतेश्वराः |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
रुदन्त्यौ तां परिष्वज्य मुहूर्तमिव तस्थतुः |
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
रुदन्नार्तस्तव सुतं कर्णश्चक्रे प्रदक्षिणम् ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
रुदन्नेवाव्रवीद्वाक्यं राजानं जनमेजय़ |
२४ क
मौसल पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
रुदन्पुत्रान्स्मरन्सर्वान्विललाप सुविह्वलः |
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
रुदितं चावधूतं च तं भागं रक्षसां विदुः ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
रुदितोपरता ह्येता ध्याय़न्त्यः सम्परिप्लुताः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
रुदित्वा तु चिरं कालं भ्रातरौ सुमहाद्युती |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
रुद्धमेकाय़ने मत्वा पतोल्मुक इवारिषु ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
रुद्धा सा सर्वतो जज्ञे तृणौषधिसमन्विता |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
रुद्ध्वा धनपतिं देवं योगेन हृतवान्वसु ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु |
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु |
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
रुद्रं नित्यं प्रणमते देवदानवसंमतम् |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
रुद्रं सत्कर्मभिर्मर्त्याः पूजय़न्तीह दैवतम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
रुद्रः पशुं मानवेन्द्र भागोऽय़मिति चाव्रवीत् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
रुद्रकोटिस्तथा कूपे ह्रदेषु च महीपते |
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्रखड्गवलोद्धूतं प्रचचाल मुमोह च ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
रुद्रदेवर्षिकन्याभिः सततं चाभिपूज्यते ||
१२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
रुद्रप्रधानानपरान्विद्धि योगान्परन्तप |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
रुद्रप्रसादाद्राजर्षेः समजाय़न्त पार्थिव ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
रुद्रमग्निं द्विजाः प्राहू रुद्रसूनुस्ततस्तु सः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
रुद्रमग्निमुमां स्वाहां प्रदेशेषु महावलाम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
रुद्रमीशानमृषभं चेकितानमजं परम् |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
रुद्रवत्प्रचरिष्यन्ति तत्र मे नास्ति संशय़ः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
रुद्रश्च क्रोधजो विप्रा यूय़ं प्रकृतय़स्तथा ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्रश्च सहितो धीमान्मित्रेण वरुणेन च ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
रुद्रसूनुं ततः प्राहुर्गुहं गुणवतां वरम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
रुद्रस्तु तेजोऽप्रतिमं धारय़ामास तत्तदा |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
रुद्रस्य तेजः प्रस्कन्नमग्नौ निपतितं च तत् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
रुद्रस्य देवराजस्य यमस्य वरुणस्य च |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
रुद्रस्य भागं यज्ञे च विशिष्टं ते त्वकल्पय़न् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
रुद्रस्य यज्ञभागं च विशिष्टं ते न्वकल्पय़न् |
५० क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
रुद्रस्य वह्नेः स्वाहाय़ाः षण्णां स्त्रीणां च तेजसा |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
रुद्रस्य विक्रमं दृष्ट्वा भीता देवाः सहर्षिभिः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
रुद्रस्याक्रीडसङ्काशः संहारः सर्वदेहिनाम् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
वदान्य उवाच
रुद्रस्याय़तनं दृष्ट्वा सिद्धचारणसेवितम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
रुद्रस्येव हि क्रुद्धस्य निघ्नतस्तु पशून्यथा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
रुद्राः साध्यास्तथादित्या वसवोऽथाश्विनावपि |
७६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्राक्रीडनिभं दृष्ट्वा तदा विशसनं स्त्रिय़ः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
रुद्राणां च तथा लोकान्व्रह्मलोकं च गच्छति ||
१२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्राणां च वसूनां च स्थानं यच्च वृहस्पतेः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्राणां तं गणाद्विद्धि सम्भूतमतिपौरुषम् ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
रुद्राणां तमधीवासं दिवि दिव्यं मनोहरम् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
रुद्राणां वा वसूनां वा मरुतां वा प्रधानभाक् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्राणामपरः पक्षः साध्यानां मरुतां तथा |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
रुद्राणामपि चेशानं गोप्तारं विदधे प्रभुः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
रुद्राणामपि यो रुद्रः प्रभुः प्रभवतामपि |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
रुद्राणामिव कापाली वसूनामिव पावकः |
२५ क