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अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
वसिष्ठ उवाच
रुद्राणी तु ततः क्रुद्धा प्रजोच्छेदे तथा कृते |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
रुद्राणीकूपमासाद्य ह्रदे तत्र समाश्वसत् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्राण्याः संशय़ो यश्च दम्पत्योस्तं च मे शृणु ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
रुद्रादित्यवसूनां च तथान्येषां दिवौकसाम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या; विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च; साध्या विश्वे मरुतां षड्गणाश्च |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्रादित्यास्तथा सिद्धा भुजगा दानवाः खगाः |
३० क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
रुद्रावर्तं ततो गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्राश्च वसवश्चैव मरुतश्च महावलाः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
रुद्राय़ वहुरूपाय़ वहुनाम्ने निवोध मे ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
रुद्राय़ शितिकण्ठाय़ कनिष्ठाय़ सुवर्चसे ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
रुद्राय़ शितिकण्ठाय़ सुरूपाय़ सुवर्चसे ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
रुद्रेण शुक्रमुत्सृष्टं तच्छ्वेतः पर्वतोऽभवत् |
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
रुद्रेणाग्निं समाविश्य स्वाहामाविश्य चोमय़ा |
९ क
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्रैरिव यमो राजा मरुद्भिरिव वासवः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभुः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यामपि चर्षिभिः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
रुद्रो धाता च विष्णुश्च यज्ञः पूषार्यमा भगः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
रुद्रो नाराय़णश्चैव सत्त्वमेकं द्विधाकृतम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
रुद्रो रोषात्मको जातो दशान्यान्सोऽसृजत्स्वय़म् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
रुद्रो वहुशिरा वभ्रुर्विश्वय़ोनिः शुचिश्रवाः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
रुद्रोऽय़ं भीमरूपेण धार्तराष्ट्रेषु गृध्यति ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
रुद्रौ द्वाविव सम्भूतौ यथा द्वाविव भास्करौ |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
रुधिरं च महाकाय़ावभिवृष्टाविवाचलौ ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
रुधिरं चापि वर्षन्तो विनेदुस्तोय़दाम्वरे ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १४
भीमसेन उवाच
रुधिरं न व्यतिक्रामद्दन्तोष्ठं मेऽम्व मा शुचः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
रुधिरं पतगैः सार्धं प्राणिनां पपुराहवे ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
रुधिरं पीय़मानेन किं स्विद्दुर्योधनोऽव्रवीत् ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
रुधिरं वमन्ती ददृशे प्रत्यादित्यमपस्वरा ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
रुधिरस्यन्दिनीं तत्र भीमः प्रावर्तय़न्नदीम् ||
९४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
रुधिरस्येव ते गन्धः शवस्येव च दर्शनम् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
रुधिराक्तौ ततस्तौ तु शुशुभाते नरर्षभौ |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
रुधिराप्लुतसर्वाङ्ग आशीविष इव श्वसन् ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
रुधिराप्लुतसर्वाङ्गो नन्दय़न्पाण्डवान्युधि ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
रुधिरार्द्रा च धर्मज्ञ चीरवस्त्रनिवासिनी ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
रुधिरेण परिक्लिन्ना प्रवभौ वसुधा तदा |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
रुधिरेण परीताङ्गाः श्वसृगालादनीकृताः ||
७३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
रुधिरेण समास्तीर्णा भाति भारत मेदिनी |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
रुधिरेण समुन्मिश्रमस्थिवर्षं तथैव च ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
रुधिरेणानुलिप्ताङ्गा भान्ति चित्रैः शरैर्हताः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
रुधिरेणापरे राजंस्तत्राग्निं समवाकिरन् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
रुधिरेणावलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
रुधिरेणावलिप्ताङ्गौ द्वाविवार्कौ नभश्च्युतौ ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं गृहद्वारमुपागतम् ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं दृष्ट्वा सैन्यमभज्यत ||
६४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं प्रस्रवन्तं यथाचलम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
रुधिरेणावसिक्ताङ्गा गैरिकप्रस्रवा इव |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
रुधिरेणावसिक्ताङ्गो जलसन्धस्य कुञ्जरः |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसंनाहैरात्तशस्त्रैरुदाय़ुधैः |
५४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गः कालसृष्ट इवान्तकः ||
३९ ख