chevron_left  रुधिरोक्षितसर्वाङ्गःarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गः सूतपुत्रः प्रतापवान् |
६४ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गा विप्रविद्धैर्निय़न्तृभिः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गैस्तैस्तदाय़ोधनं वभौ |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गो भीमसेनो व्यरोचत |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गौ कुरुवृष्णिय़शस्करौ |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गौ गदाहस्तौ मनस्विनौ |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
रुधिरोदकचित्रा च भीरूणां भय़वर्धिनी ||
७६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
रुधिरौघपरिक्लिन्नं रुधिरार्द्रं वभूव ह ||
७६ ग
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
रुधिरौघपरिक्लिन्नः प्रविश्य विपुलं तमः ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
रुधिरौघपरिक्लिन्नाः क्लिश्यमानाश्च भारत |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
रुधिरौघपरिक्लिन्नाः परलोकं यय़ुस्तदा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
रुधिरौघपरिक्लिन्नौ व्यभ्राजेतां महामृधे ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
रुधिरौघवतीं कृत्वा नदीं शोणितकर्दमाम् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
रुरुं निपाने लिप्सन्तौ व्याघ्रवत्तावतिष्ठताम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
रुरुः प्रमद्वराय़ां तु शुनकं समजीजनत् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
रुरुचर्मावृततनून्ह्रिय़ा किञ्चिदवाङ्मुखान् |
११ क
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
रुरुदुः कीचकं दृष्ट्वा परिवार्य समन्ततः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
रुरुदुः कृपय़ाविष्टा रुरुस्त्वार्तो वहिर्ययौ ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
रुरुदुः शोकसन्तप्ता मुहूर्तं पितृमातृवत् ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
रुरुदुः सर्वतो राजन्समेताः कुरुजाङ्गलाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
रुरुदुश्चापरास्तत्र प्रजघ्नुश्च परस्परम् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
रुरुदुश्चुक्रुशुश्चैव दुःखशोकसमन्विताः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
रुरुधुः पाण्डुपाञ्चाला व्याधिं मन्त्रौषधैरिव ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
रुरुभिश्च वराहैश्च पक्षिभिश्च निषेवितम् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
रुरुवारणशार्दूलसिंहद्वीपिसमाकुलम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
रुरुवारणसङ्घाश्च महिषाश्च जलाश्रय़ाः ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
रुरुवुर्वारणाश्चैव तथैव मृगपक्षिणः |
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२
सूत उवाच
रुरुश्चापि वनं सर्वं पर्यधावत्समन्ततः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
रुरुश्चुक्रोश गहनं वनं गत्वा सुदुःखितः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
धृतराष्ट्र उवाच
रुरूणामिव यूथेषु व्याघ्राः प्रहरतां वराः |
२० क
वन पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
रुरून्कृष्णमृगांश्चैव मेध्यांश्चान्यान्वनेचरान् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
रुरोद कृष्णा सोत्कम्पं सस्वरं वाष्पगद्गदम् ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
रुरोद च नरव्याघ्र हा राजन्निति दुःखितः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
रुरोद च भृशं राजन्वैदर्भी शोककर्शिता |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
रुरोद राजा तं दृष्ट्वा सामात्यः सपुरोहितः |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
रुरोद शनकैः कृष्णा भीमसेनमुदीक्षती ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
रुरोद सस्वनं सर्वो राजभक्त्या कृपान्वितः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
भीष्म उवाच
रुरोद सा शोकवती वाष्पव्याकुललोचना |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
रुरोध द्रौणिमाय़ान्तं प्रभञ्जनमिवाद्रिराट् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
रुरोध सर्वतः पार्थः शरैः कनकभूषणैः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
रुरोधार्जुनमाय़ान्तं प्रभञ्जनमिवाद्रिराट् |
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
रुरोरपि सुतो जज्ञे शुनको वेदपारगः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
रुरोस्तस्याय़ुषोऽर्धेन सुप्तेव वरवर्णिनी ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
रुवन्ति रावं विहगाः षट्पदैः सहिता मृदु ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
रुवन्तो भैरवान्नादान्पेतुर्दीप्ते विभावसौ ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
रुवन्तो विविधान्रावाञ्जलदोपमनिस्वनाः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
रुशदश्वाद्भरद्वाजो द्रोणस्तस्मात्कृपस्ततः |
७९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
रुषङ्गुरव्रवीत्तत्र नय़ध्वं मा पृथूदकम् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
रुषङ्गुर्व्राह्मणो वृद्धस्तपोनित्यश्च भारत |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
रुषदश्वो वसुमनाः पुरुकुत्सो ध्वजी रथी |
१३ क