शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
रूपय़ौवनसौभाग्यं स्त्रीणां वलमनुत्तमम् ||
७३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
रेजतुः पुरुषव्याघ्रौ शकुन्ताविव पञ्जरे ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
रेजतुः समरे राजन्पुष्पिताविव किंशुकौ ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
रेजतुश्चित्ररूपौ तौ सङ्ग्रामे मत्स्यसैन्धवौ ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
रेजुः पताका रथदन्तिसंस्था; वातेरिता भ्राम्यमाणाः समन्तात् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
रेजुरभ्रघनप्रख्या रुधिरौघप्रवर्षिणः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
रेजुस्तत्र पताकाश्च श्वेतच्छत्राणि चाभिभो |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
रेणुका स्नातुमगमत्कदाचिन्निय़तव्रता ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
रेणुकां त्वथ सम्प्राप्य भार्यां भार्गवनन्दनः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
रेणुकां वरय़ामास स च तस्मै ददौ नृपः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
नारद उवाच
रेणुकाय़ां यथार्चीको हैमवत्यां च कौशिकः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
रेणुकाय़ाश्च तत्रैव तीर्थं देवनिषेवितम् |
९८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
रेणुके किं चिरेण त्वमागतेति पुनः पुनः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
रेणुध्वस्तं दीर्घभुजं मातङ्गसमविक्रमम् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
रेतः शरीरभृत्काय़े विज्ञाता तु शरीरभृत् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
रेतः स्कन्नं सरस्वत्यां तत्सा जग्राह निम्नगा ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
रेतजो वा भवेत्पुत्रस्त्यक्तो वा क्षेत्रजो भवेत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
रेतो वटकणीकाय़ां घृतपाकाधिवासनम् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
युधिष्ठिर उवाच
रेतोजं विद्म वै पुत्रं क्षेत्रजस्यागमः कथम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
रेतोधाः पुत्र उन्नय़ति नरदेव यमक्षय़ात् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
रेतोधाः पुत्र उन्नय़ति नरदेव यमक्षय़ात् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
रेमाते यत्र तौ नित्यं नरनाराय़णावृषी |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
रेमिरे कथय़न्तश्च सर्ववेदविदां वराः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
वैशम्पाय़न उवाच
रेमिरे पुरुषव्याघ्राः प्राप्तराज्याः परन्तपाः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
रेमिरे रमणीय़ेषु पर्वतेषु वनेषु च ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
रेमुः श्रुत्वा विचित्रार्था धनञ्जय़कथा विभो ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
रेमे तस्मिन्गिरौ राजा तय़ैव सह भार्यया ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२४
लोमश उवाच
रेमे महीपः शर्यातिः कृत्स्नां प्राप्य महीमिव ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
नारद उवाच
रेमे स तस्यां राजर्षिः प्रभावत्यां यथा रविः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
रेमे स तां समासाद्य कृतपुण्य इव श्रिय़म् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
रेमे सह तय़ा राजा शच्येव वलवृत्रहा ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
रेवती दिवि नक्षत्रं पितामहकृतो विधिः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
रेसतू रोदसी गाढं मुमुहुश्च महर्षय़ः ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
१३८
शूद्र उवाच
रैभ्यं गतो नूनमसौ सुतस्ते मन्दचेतनः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
रैभ्यस्य तु सुतावास्तामर्वावसुपरावसू |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
रैभ्यो विद्वान्सहापत्यस्तपस्वी चेतरोऽभवत् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
रैवतस्य तु कौमारः श्यामस्य तु मणीचकः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
रैवताद्युवनाश्वश्च युवनाश्वात्ततो रघुः ||
७६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
रैवतेन रन्तिदेवेन वसुना सृञ्जय़ेन च ||
६७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
रोगरक्षोभय़ाच्चैव राष्ट्रं स्वं परिरक्षसि ||
११२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
रोगार्तास्ते भवन्तीह नरा दुष्कृतकर्मिणः ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
रोगार्तो मुच्यते रोगाद्वद्धो मुच्येत वन्धनात् |
१२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
रोगार्दिता न फलान्याद्रिय़न्ते; न वै लभन्ते विषय़ेषु तत्त्वम् |
६७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
रोचतां गमनं मह्यं तवापि पुरुषर्षभ ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२१
जरितो उवाच
रोचतामेष वोपाय़ो विमोक्षाय़ हुताशनात् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
रोचते ते पितुस्तात पाण्डवैः सह सङ्गमः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वासुदेव उवाच
रोचते मे महावाहो क्रिय़तां यदनन्तरम् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
रोचते मे महावाहो गमनं तव केशव |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
रोचते मे महावाहो यदिदं भाषितं त्वय़ा |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
रोचते मे महावाहो सततं तव भाषितम् ||
५० ख