वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
रोचते मे वचः कृत्स्नं व्राह्मणानां न संशय़ः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
रोचते यदि युष्माकं तन्मा प्रव्रूत माचिरम् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
रोचमान इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
रोचमानावदृश्येतामिन्द्राग्न्योः सदृशौ रणे ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
रोचमानो महाराज पाण्डवानां महारथः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
रोचमानौ नरव्याघ्रौ रोचमानौ ग्रहाविव |
७१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
रोचितो भवता सार्धं जानतापि वलं तव ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
रोचिष्णु जाय़ते तत्र तद्रूपगुणमुच्यते ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
रोदनाश्रुमलक्षारं सङ्गत्यागपराय़णम् ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
रोदिष्यन्ति स्त्रिय़ो ह्येवं येषां क्रुद्धासि भामिनि ||
११४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
रोधं मोक्षं च शाल्वेन हार्दिक्यो राजसत्तम ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
रोमकूपेषु च तथा सूर्यस्येव मरीचय़ः ||
११ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
रोमभिः संनिरुद्धाङ्गमलर्कं नाम नामतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
रोमहर्षश्च तीव्रोऽभून्निःश्वासश्च महान्नृप ||
२ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
रोरूय़माणः प्रय़यौ सुताना; माय़ोधनं भूतगणानुकीर्णम् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
रोरूय़माणस्याभ्याशे तस्य विप्रस्य पाण्डवः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
रोरूय़माणा कृपणा सुतान्दृष्टवती वने ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
रोरूय़माणा दुःखार्ता दुःशला सा भविष्यति ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
रोरूय़माणांस्तान्सर्वान्परिदेवय़तश्च सा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
रोरूय़माणे च मय़ि क्रिय़तामस्त्रधारणम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नाग उवाच
रोषः सङ्कल्पजः साध्वि दग्धो वाचाग्निना त्वय़ा ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
रोषदोषानुषङ्गेण तिर्यग्योनिगतावपि |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
रोषनिर्जितजीमूतो मनोऽभिप्राय़शीघ्रगः |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
रोषरोदनताम्राणि वक्त्राणि कुरुय़ोषिताम् ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
रोषसंरक्तनेत्राणि सन्दष्टौष्ठानि भूतले |
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
रोषात्प्रचलितं सर्वमिदमाह युधिष्ठिरः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
रोषात्प्रस्फुरमाणोष्ठौ निरीक्षन्तौ परस्परम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
रोषादिव प्रवृत्तोऽय़ं यथाय़मितरो जनः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
रोषाद्दुःशासनं चैव सौवलेय़ं च तावुभौ ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
रोषाद्द्रोणविनाशाय़ वीरः समितिशोभनः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६
सूत उवाच
रोषान्मातुश्च्युतः कुक्षेश्च्यवनस्तेन सोऽभवत् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
रोषितो भरतश्रेष्ठ कौन्तेय़ेन यशस्विना ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
रोषेण महताविष्टः शूलमुद्यम्य मारिष |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
रोहते साय़कैर्विद्धं वनं परशुना हतम् |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
रोहिणी च यथा सोमे दमय़न्ती यथा नले ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
महेश्वर उवाच
रोहिणी शशिनः साध्वी स्वाहा चैव विभावसोः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
रोहिणीं चैव भद्रं ते गन्धर्वीं च यशस्विनीम् |
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
रोहिणीं तुल्यवत्सां तु धेनुं दत्त्वा पय़स्विनीम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
रोहिणीं निवसत्येव प्रीय़माणो मुहुर्मुहुः ||
४९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
रोहिणीं पीडय़न्नेष स्थितो राजञ्शनैश्चरः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
रोहिण्य इति जानीहि नैताभ्यो विद्यते परम् ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
रोहिण्या सार्धमवसत्ततस्ताः कुपिताः पुनः ||
५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
रोहिण्यां जज्ञिरे गावो गन्धर्व्यां वाजिनः सुताः ||
६५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
रोहिण्यां प्रथितैर्मांसैर्माषैरन्नेन सर्पिषा |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
रोहिण्याद्योऽभवत्पूर्वमेवं सङ्ख्या समाभवत् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
रोहिण्यामेव भगवन्सदा वसति चन्द्रमाः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
रोहिण्यो गोत्रमस्याथ रुद्रश्च गुरुरुत्तमः ||
८० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
रौक्मं रथं हस्तिवरैश्च युक्तं; रथं दित्सुर्यः परेभ्यस्त्वदर्थे |
३४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
रौक्माणि चैव वर्माणि निष्कानपि च काञ्चनान् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
रौक्मिणेय़ः स्मितं कृत्वा दर्शय़न्हस्तलाघवम् ||
१५ ख