chevron_left  रजस्तामससत्त्वैश्चarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
रजस्तामससत्त्वैश्च युक्तो मानुष्यमाप्नुय़ात् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
रजस्यन्तर्हिता मूर्तिरिन्द्रिय़ाणां सनातनी ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
रजस्येतानि जाय़न्ते विवृद्धे भरतर्षभ ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
रजस्वलमथादृश्यं त्रिगुणं च त्रिधातुकम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
रजस्वलमनित्यं च भूतावासं समुत्सृज ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
अग्निरु उवाच
रजस्वला च या नारी व्यङ्गिता कर्णय़ोश्च या |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
रजस्वला भृशोद्विग्ना वीक्षमाणा दिशो दश ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
रजस्वला वा भव याज्ञसेनि; एकाम्वरा वाप्यथ वा विवस्त्रा |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
रजस्वला वेपमाना वीक्षमाणा दिशो दश |
७० क
शल्य पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
रजस्वलां द्रौपदीमानय़न्ये; ये चाप्यकुर्वन्त सदस्यवस्त्राम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
रजस्वलां नाथवतीमनाथव; त्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
रजस्वलाभिर्दृष्टं च तं भागं रक्षसां विदुः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
व्रह्मो उवाच
रजस्वलासु नारीषु यो वै मैथुनमाचरेत् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
रजांसि मुकुटान्येषामुत्थितानि व्यधर्षय़न् ||
३२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
रजो दृष्ट्वा समुद्भूतं श्रुत्वा च गजनिस्वनम् |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
रजो निगृह्यतामेतच्छृणु चेदं वचो मम ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
रजो वहति राजेन्द्र सत्त्वस्य परमां गतिम् ||
७३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३७
व्रह्मो उवाच
रजोगुणा वो वहुधानुकीर्तिता; यथावदुक्तं गुणवृत्तमेव च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
रजोगुणानां सङ्घातो रूपमैश्वर्यविग्रहे |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
रजोधूमोऽस्त्रसन्तापो धार्तराष्ट्रानिलोद्धतः ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
रजोध्वस्ताः पङ्कदिग्धाः सर्वे शुक्लाम्वरस्रजः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
रजोभूतैर्हि करणैः कर्मणा प्रतिपद्यते ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
रजोमूढेन मनसा क्षेप्तुं शङ्कितुमेव च ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
रजोमेघाश्च सञ्जज्ञुः शस्त्रविद्युद्भिरावृताः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
रजोमेघैश्च तुमुलैः शस्त्रविद्युत्प्रकाशितैः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
रजोवृता दिशः सर्वाः पांसुवर्षैः समन्ततः |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३७
व्रह्मो उवाच
रजोऽहं वः प्रवक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तमाः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
रज्जुभिश्च विचित्राभिः सपाशाः सपरिस्तराः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
रज्ज्वा च मरणं जन्तोरुच्चाच्च पतनं तथा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
रञ्जिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शव्द्यते ||
१२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
रञ्जय़न्प्रकृतीः सर्वाः परिपाहि वसुन्धराम् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
रञ्जय़स्व प्रजाः सर्वाः प्रकृतीः परिसान्त्वय़ |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
द्रौणिरु उवाच
रणं च याते भवति पाण्डवा मन्दचेतसः |
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
रणगतमभिय़ान्ति सिन्धुराजं; न स भविता सह तैरपि प्रभाते ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
रणभूमिरभूद्राजन्महावैतरणी यथा ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
रणभूमिवहां घोरां कुरुसृञ्जय़वाहिनीम् |
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
रणमण्डलमध्यस्थौ भ्रातरौ तौ नरर्षभौ |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
रणमध्यादपोवाह सौभद्रशरपीडितम् ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
रणमध्ये द्वय़ोरेव सुमहल्लोमहर्षणम् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
रणमध्ये व्यदृश्यन्त कुर्वन्तो महदाकुलम् ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
रणमूर्ध्नि हतो भीष्मः पश्यतां वः किरीटिना |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
रणस्थो भीमसेनश्च कथ्यन्ते सदृशास्त्रय़ः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
रणाङ्गणं तदभवन्मृत्योराघातसंनिभम् ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
रणाजिरं नृवीराणामद्भुतं लोमहर्षणम् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
रणाजिरममित्रघ्न यदि जानासि शंस मे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
रणाजिरे यत्र शराग्निसंस्तरे; नृपात्मजो घातमवाप्य दह्यते |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
रणाजिरे वीतभय़ौ विरेजतुः; समानय़ानाविव विष्णुवासवौ ||
५४ ख
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
रणादपाहरत्तूर्णं शिक्षितो दारुकिस्ततः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
रणादाय़ान्तमुचितं प्रत्युद्याति हसन्निव ||
१६ ख