विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
रणाद्विमुक्तं स्थितमेकमाजौ; स धार्तराष्ट्रस्त्वरितो वभाषे ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
रणान्तकं तर्कय़से महावातमिव द्रुमः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
रणाय़ निर्ययौ राजा हतशेषैर्नृपैः सह ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
रणाय़ महते युक्ता दंशिता भरतर्षभ ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
रणाय़ महते युक्तो भ्रातृभिः परिवारितः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
रणाय़ महते राजंस्त्वय़ा वाक्षल्यपीडितः ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
रणे कर्णे हते वीरे त्रासिता जितकाशिभिः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
रणे कर्म महत्कर्ता तत्र मे नास्ति संशय़ः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
रणे कृत्वा महाय़ुद्धं घोरं त्रैलोक्यविश्रुतम् ||
५३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
रणे चन्द्रमसोऽभ्याशे शनैश्चर इव ग्रहः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
रणे चारूणि चापानि हेमपृष्ठानि भारत |
४७ क
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
रणे जित्वा कुरून्सर्वान्वज्रपाणिरिवासुरान् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
रणे जीवन्विमुच्येत पदा भूमिमुपस्पृशन् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
रणे जय़ं प्रार्थय़न्तो भृशं युय़ुधिरे तदा ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
रणे जय़मभीप्सन्तः कौन्तेय़ं पर्यवारय़न् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
रणे तवार्थाय़ महानुभाव; न जीवितं रक्ष्यतमं ममाद्य |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
रणे तस्मिन्सुमहति विजय़ाय़ सुतस्य ते |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
रणे तेन विराटेन पाण्डवा अभ्ययुञ्जत ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
रणे पण्डितकश्चैनं त्रिभिर्वाणैः समर्दय़त् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
रणे पर्यचरद्द्रोणो वृद्धः षोडशवर्षवत् ||
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
रणे पर्यचरद्द्रोणो वृद्धः षोडशवर्षवत् ||
१०३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
रणे पुरस्कृत्य नराधिपांस्ता; ञ्जगाम पार्थं त्वरितो वधाय़ ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
रणे प्रसोढुं विषहेत राज; न्राधेय़गुप्तान्सह भूमिपालैः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
रणे प्रैषीन्महावेगान्यमदण्डोपमांस्तथा ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
रणे भरतसिंहस्य ददृशुः क्षत्रिय़ा गतिम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
रणे भारत पार्थेन द्रोणो विद्धस्त्रिभिः शरैः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
रणे भारतमाय़ान्तमाससाद महावलम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
रणे भीष्मं तथा द्रोणं कृपं शल्यं जय़द्रथम् |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
रणे महेन्द्रप्रतिमाः स कथं नाप्नुय़ाद्दिवम् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
रणे यं प्रेक्ष्य सीदन्ति हृतस्वा वणिजो यथा |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
रणे रणेऽतिमानी च विमुखश्चैव दृश्यते |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
रणे रणोत्कटौ राजन्नन्योन्यं पर्यकर्षताम् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
रणे रथानामय़ुतं निहत्य; हता गजाः सप्तशतार्जुनेन |
१३० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
रणे राज्ञः शय़ानस्य कृपणं पर्यदेवय़न् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
रणे वराहकर्णेन राजानं हृदि विव्यधे ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
रणे वहुविधं चक्रे सर्वशस्त्रभृतां वरः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
रणे विचरतस्तस्य तस्मिँल्लोहितकर्दमे ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अकृतव्रण उवाच
रणे विनिर्जितं द्रष्टुं कुर्यात्तदपि भार्गवः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
धृतराष्ट्र उवाच
रणे विनिहतं श्रुत्वा भृशं मे दीर्यते मनः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
रणे विनिहतं श्रुत्वा शोकार्ता वै विनङ्क्ष्यति |
५३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२१
गान्धार्यु उवाच
रणे विनिहतः शेते शूरो गाण्डीवधन्वना ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
रणे विनिहतान्नागान्दृष्ट्वा पत्तींश्च मारिष |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
रणे विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
रणे वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथौ स्मृतौ |
९० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
रणे शस्त्राग्निना दग्धाः प्राप्स्यन्ति यमसादनम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
रणे संन्यपतन्राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
रणे सन्त्यजति प्राणान्द्वितीय़स्त्वं च सात्यके ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
रणे सपत्नान्निघ्नन्तं जिगीषन्तन्परान्युधि ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
धृतराष्ट्र उवाच
रणे समीय़तुर्यत्तौ तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
रणे हते कौरवाणां प्रवीरे; शिखण्डिना सत्तमे शन्तनूजे |
३५ क