शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
रणे ह्यभ्यद्रवंस्ते तु शकुनिं युद्धदुर्मदम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
रणेषु कदनं कृत्वा ज्ञातिभिः परिवारितः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
रणेष्वद्भुतकर्मा च रथः पररथारुजः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
रणेऽप्रेषय़त क्रुद्धः सूतपुत्रस्य मारिष ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
रणेऽभवद्वलौघानामन्योन्यमभिधावताम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
रणेऽभिमन्युं ददृशुस्तदा जना; व्यपोढहव्यं सदसीव पावकम् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
रणेऽभिमन्युः क्षणदासुभद्रः; स वासुभद्रानुकृतिं प्रकुर्वन् ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
रणेऽभिमन्योः क्रुद्धस्य रूपमन्तरधीय़त ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
रणेऽहन्यत पुत्रैस्ते शतशोऽथ सहस्रशः ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
रणोत्कटः प्रहासश्च श्वेतशीर्षश्च नन्दकः ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
रणोत्कटौ सारणचारुदेष्णौ; कुलोचितं विप्रथय़न्तु कर्म ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
जनमेजय़ उवाच
रणय़ज्ञे प्रतिभय़े स्वाभीले लोमहर्षणे |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
रताहं च्यवने पत्यौ मैवं मा पर्यशङ्किथाः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
रताय़ाश्चाप्यहः पुत्रः शाण्डिल्याश्च हुताशनः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
रतिं प्रीतिं च धर्मं च तास्वाय़त्तमवेक्ष्य च ||
५० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
रतिः क्रीडामय़ी तुभ्यं माय़ा ते रोदसी विभो ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
रतिः प्रमोदश्च वभूव तेषा; माकाङ्क्षतां दर्शनमर्जुनस्य ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
रतिः साधारणो धर्म इति चाह स पार्थिवः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
रतितीर्थश्च वाग्मी च सर्वकामगुणावहः |
१०३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
रतिपुत्रफला दारा दत्तभुक्तफलं धनम् ||
५१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
रतिपुत्रफला दाराः शीलवृत्तफलं श्रुतम् ||
१०१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
रतिप्रधानाश्च तथा जाय़न्ते तत्र मानवाः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
रतिमप्राप्नुवन्स्त्रीषु वभूव वनगोचरः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
दुर्योधन उवाच
रतिर्हि नास्ति मे राज्ये हतपक्षस्य भारत ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
रतिस्तुष्टिर्धृतिः क्षान्तिस्त्वय़ि चेदं चराचरम् |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
रतीनां वसुमत्यस्तु स्त्रीणामप्सरसस्तथा ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
जनमेजय़ उवाच
रत्नं च यन्मरुत्तेन निहितं पृथिवीतले |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
रत्नचित्राङ्गदधराः समुद्यतकरास्तथा |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
रत्नजालपरिक्षिप्तं चित्रमाल्यधरं शिवम् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
रत्नदानं च सुमहत्पुण्यमुक्तं जनाधिप |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
रत्नप्रदानवहुलः शोभितो नटनर्तकैः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
रत्नप्रभूतो रक्ताङ्गो महार्णवनिपानवित् ||
१२० ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
रत्नभाजं च दाशार्हं चक्रुस्ते पृथिवीश्वराः |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय
१४
कृष्ण उवाच
रत्नभाजो हि राजानो जरासन्धमुपासते |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
रत्नभूमिं प्रदत्त्वा तु कुलवंशं विवर्धय़ेत् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
रत्नराशीन्विनिक्षिप्य दक्षिणार्थे स भारत |
१८ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
रत्नलोभान्महाराज तौ चाक्षय़्यौ महेषुधी ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
रत्नवन्ति महार्हाणि भाजनान्यासनानि च ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
रत्नवन्ति विशालानि वेश्मानीव दिवौकसाम् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
रत्नशृङ्गो मृगो भूत्वा रत्नचित्रतनूरुहः ||
११ ख
मौसल पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
रत्नशैवलसङ्घाटां वज्रप्राकारमालिनीम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
रत्नाकरममित्रघ्न निधानं पय़सो महत् ||
९७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
रत्नाकरसमुद्रान्तांश्चातुर्वर्ण्यजनावृतान् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
रत्नाकराः समुद्राश्च सर्व एव चतुर्दिशम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
रत्नाकरास्तथा नद्यस्तेषां नामानि मे शृणु |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
रत्नाञ्जलिमथैकं च व्राह्मणेभ्यो ददौ तदा ||
९३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
गङ्गो उवाच
रत्नानामुत्तमं रत्नं भूषणानां तथोत्तमम् |
८१ क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
रत्नानि गाः सुवर्णं च मणिमुक्तमथापि वा |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
रत्नानि च महार्हाणि धनं धान्यं च पुष्कलम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
रत्नानि च विचित्राणि महार्हाणि महाय़शाः ||
२ ग