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शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
लक्षणं च प्रवक्ष्यामि सत्यस्येह यथाक्रमम् ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय ३
सहदेव उवाच
लक्षणं चरितं चापि गवां यच्चापि मङ्गलम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
इन्द्र उवाच
लक्षणं चैतदेवेह भविता ते नराधिप |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
वोध्य उवाच
लक्षणं तस्य वक्ष्येऽहं तत्स्वय़ं प्रविमृश्यताम् ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
लक्षणं पञ्चवर्गस्य त्रिविधं चात्र वर्णितम् ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
लक्षणं महतो ध्यानमव्यक्तं साधुलक्षणम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
लक्षणं हि प्रसादस्य यथा स्यात्स्वप्नदर्शनम् ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
लक्षणानि स्वराः स्तोभा निरुक्तं स्वरभक्तय़ः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
लक्षणैरन्विता या च प्रशस्ता या च लक्षणैः |
१२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
लक्षण्यो गोवृषो यानं यत्प्रधानतमं भवेत् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
लक्षितं च मय़ा क्षीरं स्वादुतो ह्यमृतोपमम् ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय ६६
सुदेव उवाच
लक्षितेय़ं मय़ा देवी पिहितोऽग्निरिवोष्मणा ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
लक्ष्मणं निहतं दृष्ट्वा हा हेत्युच्चुक्रुशुर्जनाः ||
१७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
लक्ष्मणः क्षत्रदेवेन विमर्दमकरोद्भृशम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
लक्ष्मणश्च मय़ा दृष्टो निरीक्षन्सर्वतोदिशः ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
लक्ष्मणस्तव पुत्रस्तु तथा दुःशासनस्य च |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
लक्ष्मणस्तव पौत्रस्तु तव पौत्रमवस्थितम् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
लक्ष्मणे तव पुत्रे च किं शेषं पर्युपास्महे ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
लक्ष्मणे शरजालानि विसृजन्वह्वशोभत ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
लक्ष्मणेन तु सङ्गम्य सौभद्रः परवीरहा |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
लक्ष्मणेन हतो राजंस्तव पौत्रेण भारत ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
लक्ष्मणो नाम मेधावी स्थितः कार्यार्थसिद्धय़े ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
लक्ष्मणो राजपुत्रश्च धृष्टद्युम्नस्य चात्मजाः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
लक्ष्मणोऽपि ततस्तस्य धनुश्चिच्छेद पत्रिणा |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
लक्ष्मणोऽभ्यपतत्तूर्णं सात्वतीपुत्रमाहवे ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
लक्ष्मीररुन्धती चैव कुरुतां स्वस्ति तेऽनघ ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
लक्ष्मीश्चैषां पूर्वमेवोपदिष्टा; भार्या यैषा द्रौपदी दिव्यरूपा ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
लक्ष्मीस्तु देवानगमदलक्ष्मीरसुरान्नृप ||
९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
लक्ष्म्या परमय़ा युक्तं पुरन्दरगृहोपमम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
लक्ष्म्या सहितमासीनं मघवन्तं दिदृक्षवः ||
८६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
लक्ष्यते यतमानानां पुरुषार्थस्ततः कुतः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
लक्ष्यस्य वेद्धारमिमं हि दृष्ट्वा; हर्षस्य नान्तं परिपश्यते सः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय २२४
मन्दपाल उवाच
लक्ष्यालक्ष्या नाभिरूपा निमित्तमिव लक्ष्यते ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
लक्षय़ित्वा तु मां भीतमिदं वचनमव्रवीत् |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
लक्षय़ित्वा त्रिगर्तानां तौ प्रविष्टौ रथव्रजम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
लक्षय़ित्वा निमित्तानि तानि घोराणि सर्वशः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
लक्षय़ित्वा पुरोधास्तु वहुशस्तं नराधिपम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
लक्षय़ित्वा मृगव्याधः कामस्य वशमेय़िवान् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
लक्षय़ित्वाथ दिव्यानि महास्त्राण्युपचक्रमे ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
लक्षय़ित्वेङ्गितं सर्वं प्रिय़ं तस्मै निवेद्य च |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
लगुडाय़ोगुडाश्मानः शतघ्न्यश्च सशक्तय़ः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
लग्नगर्भा विमुच्येत गर्भिणी जनय़ेत्सुतम् |
१०५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
लग्नैः शङ्खगणैर्गात्रैः कोष्ठैश्चित्रैरिवावृतम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
लघु यासां दर्शनं वाक्च लघ्वी; वेशस्त्रिय़ः कुशलं तात पृच्छेः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
लघुतां युय़ुधानस्य लाघवेन विशेषय़न् ||
८ ख