अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
भीष्म उवाच
लोकाननुचरन्धीमान्देवर्षिर्नारदः पुरा |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
लोकाननुचरन्सर्वानागमत्तां सभामृषिः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
लोकानन्यान्समर्थोऽसि स्रष्टुं सर्वांस्तपोवलात् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
लोकानन्यान्सृजेय़ुश्च लोकपालांश्च कोपिताः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
लोकानन्वचरन्सिद्धाः सर्व एव भृगूद्वह |
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
लोकानपश्यद्गच्छन्तं जैगीषव्यं ततोऽसितः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
लोकानां गुरुरत्यन्तं लोकनाथः सनातनः |
७२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
लोकानां च भवान्यत्र शेते पांसुषु रूषितः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
लोकानां च हितं कुर्वन्नहमप्याददे वचः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
लोकानां नृप शान्त्यर्थं क्रोधिते पाण्डवे तदा ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलय़ं तं विदुर्वुधाः ||
२३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
लोकानां स हि सर्वेषां ससुरासुररक्षसाम् |
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
लोकानां हितकामार्थं मत्प्रीत्यर्थं तथैव च ||
१४६ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
लोकानात्मप्रभांश्चैव ददौ तस्मै हुताशनः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
लोकानात्मप्रभान्पश्यन्फल्गुनो विस्मय़ान्वितः |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
लोकानामादिरव्यक्तं सर्वस्यान्तस्तदेव च ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
लोकानामिह सर्वेषां त्वं कर्ता चान्त एव च |
१८ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
लोकानावृत्य यशसा तेजसा वृत्तसम्पदा |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
लोकानिमांस्त्रीन्यशसा वितत्य; सिद्धिं प्राप्य महतीं तां दुरापाम् |
९९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
लोकानिमान्नय़ति या जननीव पुत्रा; न्सर्वात्मना सर्वगुणोपपन्ना |
९३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
लोकानुय़ात्रां कुर्वाणः स्थूणस्यागान्निवेशनम् ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
लोकान्कामदुघान्प्राप्तमक्षय़ान्राजसत्तम ||
३७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
लोकान्तरगता नित्यं प्राणा नित्या हि वाजिनः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
लोकान्तरगतान्वीरानपश्यत्पुनरागतान् ||
२१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
लोकान्तरगतेष्वेषु नाहं शक्ष्यामि जीवितुम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
पितामह उवाच
लोकान्धारय़तानेन नादो मुक्तो महात्मना ||
३२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
लोकान्धारय़ते यस्त्रींश्चराचरगुरुः प्रभुः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
लोकान्नदीः समुद्रांश्च दिशः शैलान्वनस्पतीन् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
लोकान्पुण्यकृतां व्रह्मन्सद्भिरासेवितान्नृभिः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
लोकान्प्रतापय़न्सर्वान्यास्यस्मानवितर्कय़न् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
भीष्म उवाच
लोकान्प्रतापय़न्सर्वान्यास्यस्मानवितर्कय़न् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
लोकान्प्रभासय़ामास शीतांशुत्वमवाप च ||
७० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
लोकान्प्राप्ताः पुण्यशीलाः सुवृत्ता; स्तान्मे राजन्कीर्त्यमानान्निवोध ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
लोकान्वसूनामाप्नोति दिवाकरसमप्रभः ||
९१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
लोकान्वहुविधान्दिव्यान्यद्वास्य हृदि वर्तते ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
लोकान्विसर्जय़ामास सर्वैरनुचरैः सह ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
लोकान्सञ्चिन्त्य मनसा ततः शास्त्रं प्रचक्रिरे ||
२९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
लोकान्समुत्पतन्तं च शुभानेकान्तय़ाजिनाम् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
लोकान्सृजेस्त्वमपरानिच्छन्यदुकुलोद्वह ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
लोकापवादभीरुत्वात्सोऽहं पार्थं वृकोदरम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
लोकालोकविनाशे च प्रादुर्भूते तदानघ |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
लोकाल्लोकमिमं प्राप्तौ नरनाराय़णावृषी ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वै; ते नान्तवन्तः प्रतिपालय़न्ति ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
लोकास्तेजोमय़ास्तस्य कल्पन्ते शाश्वतीः समाः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
लोकास्तेजोमय़ास्तस्य तथानन्त्याय़ कल्पते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
लोकास्तेजोमय़ास्तस्य प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
लोकाय़तिकमुख्यैश्च समन्तादनुनादितम् ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
लोके कीर्तिं परां प्राप्य गतिमग्र्यां गमिष्यसि ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
लोके क्षीणे क्षय़ं यान्ति भावा लोकप्रवर्तकाः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्राह्मणा ऊचुः
लोके च परमा कीर्तिर्धर्मश्च चरितो महान् ||
२१ ख