वन पर्व
अध्याय
५१
नारद उवाच
लोके च मघवन्कृत्स्ने नृपाः कुशलिनो विभो ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
लोके च लभते पूजां परत्र च महत्फलम् ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
लोके चरति कौन्तेय़ व्यक्तिस्थं सर्वकर्मसु ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२४
इन्द्र उवाच
लोके चरन्तौ मर्त्यानां कथं सोममिहार्हतः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
लोके चाय़व्ययौ दृष्ट्वा वृक्षाद्वृक्षमिवाप्लवन् ||
९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
लोके चेदं सर्वलोकस्य न स्या; च्चातुर्वर्ण्यं वेदवादाश्च न स्युः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
लोके धाता विधाता च यौ स्थितौ मनुना सह ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
लोके न शक्यते गन्तुमपि विप्रैर्महात्मभिः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
लोके प्राणभृतां कञ्चिच्छ्रुत्वा कुन्तीं तथागताम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
लोके फलानि चित्राणि ततो न विमना ह्यहम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
लोके भूतानि सर्वाणि विचरन्ति न संशय़ः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
लोके महीय़ते सद्भिर्यो ददाति वसुन्धराम् ||
८० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
लोके मिथ्याप्रवादोऽय़ं यत्त्वय़ास्मि पराजितः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
लोके यः सर्वभूतेभ्यो ददात्यभय़दक्षिणाम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
लोके यच्च भवेच्छेषमिह स्थावरजङ्गमम् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
लोके यत्साधनं किञ्चित्सा वै वज्रतनुः स्मृता ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
लोके यान्यस्य कुर्वन्ति मनुष्याः प्रवदन्ति च ||
७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
लोके यान्यस्य पूज्यन्ते विप्रास्तानि विदुर्वुधाः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
लोके लोकविनाशाय़ परं लोकमभीप्सताम् ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
लोके वरं सर्वधनुर्धराणां; धनञ्जय़ं संय़ुगे संसहिष्ये ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
लोके विख्याय़से वीर कर्मभिः सत्यवागिति ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
लोके विपरिधावन्ति रक्षितानि स्वकर्मभिः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
लोके वुद्धिप्रकाशेन लोकमार्गो न रिष्यते ||
५२ ग
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
लोके व्यासत्वमापेदे कार्ष्ण्यात्कृष्णत्वमेव च ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
लोकेभ्यः स परिभ्रश्येद्यो मां निन्देत पापकृत् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
लोकेशं वरदं मुण्डं व्रह्मण्यं व्राह्मणप्रिय़म् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
लोकेश्वरप्रभुत्वं हि महदेतद्दुरात्मभिः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
लोकेषु पाण्डवाश्चैव गताः ख्यातिं द्विजोत्तम |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
लोकेषु विहरिष्यन्ति त्वय़ा सह परन्तप ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
लोकेषु सर्वभूतानि प्रवेक्ष्यामि नसंशय़ः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
लोकेषु स्पृहय़न्त्यन्ये पुरुषाः पुरुषेश्वर ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
लोकेऽप्याचरितो दृष्टः क्षत्रिय़ाणां पुनर्भवः ||
५ ग
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
लोकेऽप्रतिमसंस्थानामुत्फुल्लनय़नोऽभवत् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
लोकेऽस्मिन्दक्षिणानां च सर्वासां वय़मुत्तमाः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मय़ानघ |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
लोकेऽस्मिन्ननुभूतानि द्वन्द्वजानि भृशं मय़ा ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
लोकेऽस्मिन्भरतश्रेष्ठ तदद्भुतमिवाभवत् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
लोकेऽस्मिन्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
लोको दैवं समालम्व्य उदासीनो भवेन्न तु ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
लोको रक्षति चात्मानं पश्य स्वार्थस्य सारताम् ||
१४० ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
लोको वुद्धिप्रकाशेन ज्ञेय़मार्गेण दृश्यते ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
लोको ह्ययं गुणानेव भूय़िष्ठं स्म प्रशंसति ||
१ ग
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
लोकोद्धारं समासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
लोकोपक्रोशभीरुत्वाद्धर्मराजो महाय़शाः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५२
नाग उवाच
लोकोऽय़ं भवतः सर्वः का चिन्ता मय़ि तेऽनघ ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
इन्द्र उवाच
लोक्यं धर्मं पालय़ त्वं नित्ययुक्तः समाहितः |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
लोकय़ज्ञः क्रिय़ाय़ज्ञो गृहय़ज्ञः सनातनः |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
लोकय़ज्ञेन यज्ञैषी कपर्दी विदधे धनुः |
६ क