द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
मुक्ताविद्रुमचित्रैश्च मणिकाञ्चनभूषितैः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
मुक्तावैडूर्यचित्राणि हैमान्याभरणानि च ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
मुक्तास्तु रथिभिर्वाणा रुक्मपुङ्खाः सुतेजनाः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
मुक्तास्वथ प्रवालेषु मृन्मय़े राजते तथा ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
मुक्ताहारैरिव चितं च्युतैः प्रस्रवणोदकैः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
मुक्तो ज्ञातिरिति ज्ञात्वा का त्वरा मरणे पुनः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
मुक्तो न मुच्यते यश्च शान्तो यश्च न शाम्यति ||
१८८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
मुक्तो विरावः सुमहान्पर्वतो येन पूरितः ||
५८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
मुक्तो वीरक्षय़ादस्मात्सङ्ग्रामाद्रोमहर्षणात् ||
२५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
मुक्तोऽनृताद्भ्रातृवधाच्च पार्थ; हृष्टः कर्णं त्वं जहि सूतपुत्रम् ||
७१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
मुक्तोऽय़ं स्यान्न वेत्यस्माद्धर्षितो मत्परिग्रहः ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
मुक्त्वा शाखां गिरिं पुण्यं हिमवन्तं तपोर्थिनः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
मुक्त्वा शोकोद्भवं वारि नेत्राभ्यां सहसा वृषः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
मुखं ते दृश्यते वत्स गुण्ठितं रणरेणुना ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
मुखं त्वमसि देवानां यज्ञस्त्वमसि पावक |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
मुखं पद्मपलाशाक्षं वडैरादष्टमव्रणम् ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
मुखं विमृज्य पुत्रस्य भर्तुश्चैव तपस्विनी ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
मुखजा व्राह्मणास्तात वाहुजाः क्षत्रवन्धवः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
मुखजेनाग्निना क्रुद्धो लोकानुद्वर्तय़न्निव |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
मुखतः पातय़ामास शस्त्रेण निशितेन ह |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
मुखतः सोऽग्निमसृजत्प्राणाद्वाय़ुमथापि च |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
मुखतोऽसृजद्व्राह्मणान्वाहुभ्यां क्षत्रिय़ांस्तथा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
मुखप्रेक्षाश्च ते सर्वे तत्त्वमेतद्व्रवीहि मे ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
मुखमानीय़ वेपन्त्या रुरोद परवीरहा ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवोऽपि गच्छति ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
मुखमासीत्तु सैन्यस्य हनूमान्मारुतात्मजः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
मुखमासीत्सुपर्णस्य भारद्वाजो महारथः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
वैशम्पाय़न उवाच
मुखवर्णाः प्रसन्ना मे भ्रातॄणामित्यचिन्तय़त् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
मुखवर्णोऽप्रसन्नो वः सर्वेषामेव लक्ष्यते |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
मुखस्य वर्णो न विकल्पतेऽस्य; चेलुश्च गात्राणि न चापि तस्य |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
मुखाडम्वरघोषेण समाद्रवत फल्गुनम् ||
८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
मुखानि ऋतवो मासाः पादा द्वादश कीर्तिताः ||
९ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
मुखानि परमस्त्रीणां परिशुष्काणि केशव ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
मुखानि राज्ञां शोभन्ते नक्षत्राणि यथा दिवि ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
मुखान्यभिप्रवर्तन्ते येन याति तिलोत्तमा ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
मुखे युधिष्ठिरं कोपान्नैवमित्येव भर्त्सय़न् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
मुखेन गर्भं लभतां युवानौ; गतासुरेतत्प्रपदेन सूते |
७० क
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
मुखेन विस्फूर्य सुवीरराष्ट्रपं; ततोऽव्रवीत्तं द्रुपदात्मजा पुनः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
मुखेभगाः स्त्रिय़ो राजन्भविष्यन्ति युगक्षय़े ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
मुखैश्च चन्द्रसङ्काशै रक्तान्तनय़नैः शुभैः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
मुख्यमन्धकवृष्णीनामपश्यं कृष्णमागतम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
मुख्यश्चैवैष नो धर्मः क्षत्रिय़ाणां जनार्दन |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
मुख्यानमात्यानुत्सृज्य यो निहीनान्निषेवते |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
मुख्यानमात्यान्यो हित्वा निहीनान्कुरुते प्रिय़ान् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
मुख्येन शस्त्रपत्रेण ये मनुष्याः प्रधानतः |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
मुख्यो भेदो हि तेषां वै पापिष्ठो विदुषां मतः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
मुख्योऽमुख्यश्च देहश्च देहर्द्धिः सर्वकामदः |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
मुचुकुन्दश्च राजर्षिर्मित्रभानुः प्रिय़ङ्करः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
मुचुकुन्दस्ततः क्रुद्धः प्रत्युवाच धनेश्वरम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
मुचुकुन्दस्ततो राजा सोऽन्वशासद्वसुन्धराम् |
१० क