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अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
मृतपं चापि चण्डालः श्वपाकमतिकुत्सितम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
मृतपा इति विख्यातो य आसीदसुरोत्तमः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
मृतमन्यो महाराज पद्भ्यां ताडितवांस्तदा |
६४ क
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
मृतमश्रोत्रिय़ं श्राद्धं मृतो यज्ञस्त्वदक्षिणः ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय २८०
मार्कण्डेय़ उवाच
मृतमेव हि तं मेने काले मुनिवचः स्मरन् ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
मृतस्तस्यां परिक्षिप्तस्तादृशेनैव जज्ञिवान् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
मृतस्य कीर्तिर्मर्त्यस्य यथा माला गताय़ुषः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
मृतस्य कीर्त्या किं कार्यं भस्मीभूतस्य देहिनः |
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
मृतस्य तं परिजनमूचतुस्तौ क्षुधान्वितौ ||
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
मृतस्य भद्राणि कुतः कौरवेय़ कुतो जय़ः |
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
सृञ्जय़ उवाच
मृतस्य सञ्जीवनमद्य मे स्या; त्तव प्रसादात्सुतसङ्गमश्च ||
१४० ख
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
मृतस्यापि प्रिय़ं कार्यं सूतपुत्रस्य सर्वथा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
मृतस्याप्यनुमन्यन्ते मन्त्रा मन्त्राश्च कारणम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
जम्वुक उवाच
मृतस्यास्य परित्यागात्तापो वै भविता ध्रुवम् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
मृतस्योत्सृष्टदेहस्य पुनर्देहो न विद्यते ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
युधिष्ठिर उवाच
मृता इति च शव्दोऽय़ं वर्तत्येषु गतासुषु ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
मृता गर्भेषु जाय़न्ते म्रिय़न्ते जातमात्रकाः |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९७
नारद उवाच
मृता दिवसतः सूत पुनर्जीवन्ति ते निशि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
मृता मृताः प्रणश्यन्ति वीजाद्वीजं प्रवर्तते ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १६४
गन्धर्व उवाच
मृतांश्च पुनराहर्तुं यः स पुत्रान्यमक्षय़ात् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
मृतान्महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव तु महीपतीन् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
मृतान्मृतान्पन्नगेन्द्रान्यो जीवय़ति नित्यदा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
मृते कर्मनिवृत्तिश्च प्रमाणमिति निश्चय़ः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
मृते पितरि ते वीरा वनादेत्य स्वमन्दिरम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
मृते पितर्यभिक्रुद्धो रथेनैकेन भारत ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २७७
राजो उवाच
मृते भर्तरि पुत्रश्च वाच्यो मातुररक्षिता ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
मृते वा त्वय़ि जीवे वा यदि भोक्ष्यति वै जनः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
मृतेभ्यः प्रमृतं यान्ति दरिद्राः पापकारिणः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
मृतो दरिद्रः पुरुषो मृतं राष्ट्रमराजकम् |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
मृतो दुःखमनुप्राप्य वहुवर्षगणानिह |
८५ क
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
मृतो ह्ययमतो दृष्टः कथं जीवितमाप्तवान् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
मृत्तिकां मिश्रय़ित्वा त्वं लेपं कुड्येषु दापय़ेः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात्प्रमुच्यते ||
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
लुव्धक उवाच
मृत्पात्रस्य क्रिय़ाय़ां हि दण्डचक्रादय़ो यथा |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
मृत्यवे चाथ धर्माय़ किं कार्यं करवाणि वः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
मृत्युं प्राणेश्वरमथो तेजसां च हुताशनम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
मृत्युं मा विद्धि धर्मज्ञ रूपिणं स्वय़मागतम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
मृत्युः प्रोवाच रुद्राणां रुद्रेभ्यस्तण्डिमागमत् |
१६५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
मृत्युकाले सहस्राक्ष यां वृत्तिमनुकाङ्क्षते |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
मृत्युकाले हि भूतानां सद्यो जाय़ति वेपथुः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
मृत्युतो भय़मस्तीति विदुषां भूतिमिच्छताम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
मृत्युना रौद्रभावेन नित्यं वन्धुरिवान्वितः ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
मृत्युनाप्राकृतेनेह कर्म कृत्वात्मशक्तितः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
मृत्युनाभ्यधिकः सौते स त्वं मा व्यपय़ाः पुनः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
मृत्युनाभ्याहतं लोकं व्याधिभिश्चोपपीडितम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
मृत्युनाभ्याहते लोके जरय़ा परिपीडिते |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
मृत्युनाभ्याहतो लोको जरय़ा परिवारितः |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
मृत्युपाशपरिक्षिप्तं शकुनिं पुत्र वर्जय़ ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६९
पुत्र उवाच
मृत्युमापद्यते मोहात्सत्येनापद्यतेऽमृतम् ||
२८ ख