chevron_left  एतानास्थाय़arrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २३२
युधिष्ठिर उवाच
एतानास्थाय़ वै तात गन्धर्वान्योद्धुमाहवे |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
एतानि च ततोऽन्यानि निर्देश्यानीति धारणा |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
एतानि चत्वार्यभय़ङ्कराणि; भय़ं प्रय़च्छन्त्ययथाकृतानि ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
एतानि चान्यानि च कौरवेन्द्र; कर्माणि कृत्वा समरे महात्मा |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
एतानि ज्ञातिकार्याणि न विरोधः कदाचन ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
एतानि जय़मानानां लक्षणानि विशां पते |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय १११
पाण्डुरु उवाच
एतानि तु यथाकालं यो न वुध्यति मानवः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
एतानि दिवसान्यस्य युद्धे भीतो धनञ्जय़ः |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
याज्ञवल्क्य उवाच
एतानि नव सर्गाणि तत्त्वानि च नराधिप |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
एतानि पार्था निर्जित्य नित्यं वीराः सुखे रताः ||
९३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
एतानि पुरुषव्याघ्र साधुभ्यो देहि नित्यदा |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
एतानि मानवान्घ्नन्ति न मृत्युर्भद्रमस्तु ते ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
एतानि यः कुरुते नैत्यकानि; तस्योत्थानं देवता राधय़न्ति ||
९७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६५
मेनको उवाच
एतानि यस्य कर्माणि तस्याहं भृशमुद्विजे |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
एतानि यस्य गुप्तानि स राजा राजसत्तम |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
एतानि युक्त्या सेवेत प्रसङ्गो ह्यत्र दोषवान् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
एतानि रक्ष्यमाणानि धनञ्जय़ यथागमम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
एतानि राजन्पुण्यानि पृथिव्यां पृथिवीपते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
एतानि राज्ञां कर्माणि सुकृतानि विशां पते |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
एतानि वर्त्मान्यनुय़ात शीघ्रं; मा वः कालः क्षिप्रमिहात्यगाद्वै ||
२० ग
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः |
८९ क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
एतानि वै पवित्राणि तारय़न्त्यपि दुष्कृतम् ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
कश्यप उवाच
एतानि वै समान्याहुर्दुःखानि त्रिदशेश्वराः |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
एतानि शाश्वताँल्लोकान्धारय़न्ति सनातनान् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
एतानि शृण्वँल्लभते यशः कीर्तिं श्रिय़ः प्रजाः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
एतानि सर्वाण्युपसेवमानो; देवराज्यं मघवान्प्राप मुख्यम् ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
एतानि सह यज्ञेन प्रजापतिरकल्पय़त् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
एतानि हत्वा पुरुषप्रवीर; काङ्क्षस्व युद्धं भरतर्षभेण ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
एतानि हृतराज्यानां दैतेय़ानां स्म मातले |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
एतानिह विजानीय़ादपाङ्क्तेय़ान्द्विजाधमान् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
भीष्म उवाच
एतानीदृशकान्धर्मांस्तुलाधारः प्रशंसति |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
एतानीदृशकान्धर्मानाचरन्निह जाजले |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
एतानेतावतस्तत्र यानपश्यं समागतान् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
एतानेव पुरोधाय़ सत्कृत्य च यथा पुरा |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ४४
दुर्योधन उवाच
एतानेव विजेष्यामि यदि त्वमनुमन्यसे ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय २२३
द्रोण उवाच
एतान्कुरुष्व दंष्ट्रासु हव्यवाह सवान्धवान् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
एतान्गुणांस्तात महानुभावा; नेको गुणः संश्रय़ते प्रसह्य |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
एतान्गुणांस्तु क्षेत्रज्ञो भुङ्क्ते नैभिः स भुज्यते |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
एतान्गुणान्कर्मकृतानवेक्ष्य; भावाभावौ वर्तमानावनित्यौ |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
एतान्घोराननादृत्य समुत्पातान्सुदारुणान् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्देवान्नमस्यन्ति प्रतापप्रणता जनाः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्दोषांश्च कौन्तेय़ो दृष्टवानिति मे मतिः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
एतान्दोषान्नरः प्राज्ञो वुद्ध्या वुद्ध्वा विवर्जय़ेत् ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
एतान्दोषान्प्रपश्यद्भिर्जितः क्रोधो मनीषिभिः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
एतान्धर्मान्कौरवाणां पुराणा; नाचक्षीथाः सञ्जय़ राज्यमध्ये ||
२९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३१
व्राह्मण उवाच
एतान्निकृत्य धृतिमान्वाणसङ्घैरतन्द्रितः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
एतान्निहत्याजिमध्ये समेता; न्प्रीतो भविष्यामि सह त्वय़ाद्य ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
एतान्पशून्नय़ क्षिप्रं व्रह्मवन्धो यदीच्छसि ||
८ ख