अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
भृगुर्दक्षः कश्यपश्च वसिष्ठः काश्य एव च ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
भृगुर्ददावृषिभ्यस्तु तं दण्डं धर्मसंहितम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
भृगुर्यत्र तपस्तेपे महर्षिगणसेवितः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
भृगुर्वसिष्ठः कश्यपो गौतमश्च; विश्वामित्रो जमदग्निश्च राजन् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५३
शौनक उवाच
भृगुवंशात्प्रभृत्येव त्वय़ा मे कथितं महत् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
भृगुश्च विरजाश्चैव काशी चोग्रश्च धर्मवित् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
भृगुस्तस्य जटासंस्थो वभूव हृषितो भृशम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
भृगूणां कुशिकानां च प्रति सम्वन्धकारणम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५६
च्यवन उवाच
भृगूणां क्षत्रिय़ा याज्या नित्यमेव जनाधिप |
२ क
वन पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
भृगूनङ्गिरसश्चैव वासिष्ठानथ काश्यपान् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
भृगोः पुत्रः कविर्विद्वाञ्शुक्रः कविसुतो ग्रहः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
भृगोः प्रसादाद्राजेन्द्र क्षत्रिय़ः क्षत्रिय़र्षभ ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
भृगोः शापाद्भृशं भीतो जातवेदाः प्रतापवान् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
भृगोः शापान्महीपाल यदुक्तं व्रह्मवादिना |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
भृगोः सुदय़ितः पुत्रश्च्यवनो नाम भार्गवः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
भृगोः सुदय़िता भार्या पुलोमेत्यभिविश्रुता |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
भृगोर्महर्षेः पुत्रोऽभूच्च्यवनो नाम भार्गवः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
भृगोर्वचनमात्रेण स च व्रह्मर्षितां गतः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
भृगोश्च भृगुशार्दूल वंशजैः सततं जगत् ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
भृगोस्तु पुत्रास्तत्रासन्सप्त तुल्या भृगोर्गुणैः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
युधिष्ठिर उवाच
भृग्वङ्गिरसके काले मुनिना कतरेण वा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
भृग्वङ्गिरादिभिर्भूय़स्तपसोत्थापितस्तदा ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
भृग्वङ्गिरास्तथा कण्वो मेधातिथिरथ प्रभुः |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
भृग्वङ्गिरोभिः सहितो देवैश्चाप्यभिपूजितः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
भृग्वङ्गिरोमन्युभवं क्रोधाग्निमतिदुःसहम् ||
८६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
भृग्वत्र्यङ्गिरसः सिद्धाः काश्यपश्च तपोधनः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
भृङ्गराजैस्तथा हंसैर्दात्यूहैर्जलकुक्कुटैः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
भृङ्गराजोपचक्राश्च लोहपृष्ठाश्च पत्रिणः ||
७६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
भृङ्गाराणि कटाहानि कलशान्वर्धमानकान् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
भृतपुत्रा भृतामात्या भृतदारा ह्यनीर्षवः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
भृता वित्तेन महता पाण्ड्याश्चौड्राः सकेरलाः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३०
वैशम्पाय़न उवाच
भृता हि पाण्डुनामात्या वलं च सततं भृतम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३०
वैशम्पाय़न उवाच
भृताः पुत्राश्च पौत्राश्च तेषामपि विशेषतः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
भृताश्च वहवो योधाः परीक्ष्यैव महारथाः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
भृतिं चोपय़यौ तस्य सारथ्येन महीपते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
भृतो वत्सो जातवलः पीडां सहति भारत ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
भृत्यवत्प्रणतस्तस्थौ देवराजसमीपतः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
भृत्यशेषं तु योऽश्नाति तमाहुर्विघसाशिनम् ||
११ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
भृत्या मे सुभृतास्तात दीनश्चाभ्युद्धृतो जनः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
भृत्या ये यत्र योग्याः स्युस्तत्र स्थाप्याः सुशिक्षिताः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
भृत्याः परिभवन्त्येनमुदासीनास्तथैव च ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
भृत्याः पुरोहिताचार्या व्राह्मणाश्च वहुश्रुताः |
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
भृत्यातिथिजनश्चापि गृहे पर्युषितो मय़ा |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
भृत्यातिथिषु यो भुङ्क्ते भुक्तवत्सु नरः सदा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१४
भीष्म उवाच
भृत्यातिथिषु यो भुङ्क्ते भुक्तवत्सु सदा स ह |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
भृत्यानां भरणं धर्मः कृते कर्मण्यमोघता ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
नागभार्यो उवाच
भृत्यानां स्वामिवचनं राज्ञां लोकानुपालनम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
भृत्यान्भक्तिमतश्चापि तत्पराभवलक्षणम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
भृत्यान्भोगैर्द्विषो दण्डैर्यो योजय़ति सोऽर्थवान् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
भृत्यान्सुतान्संविभज्य ततो व्रज यथेप्सितम् |
५ ख