आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
एकः स्थिरश्चास्थिरश्च विशेषात्पञ्च वाय़वः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
एकः स्वादु न भुञ्जीत एकश्चार्थान्न चिन्तय़ेत् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
एकः स्वय़म्भूर्भगवानाद्यो व्रह्मा सनातनः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
एककार्यसमुद्युक्तौ कृष्णौ युद्धेऽपराजितौ ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
एककालं चरन्भैक्षं कुलानि द्वे च पञ्च च |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
एककालं चरन्भैक्ष्यं गृहे द्वे चैव पञ्च च |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
एककालं तु भुञ्जानश्चरन्भैक्षं स्वकर्मकृत् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
एककालं निराहारो लोकानावसते शुभान् ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
एकग्रीवस्त्वेककाय़ः कुमारः समपद्यत ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
एकचक्र इति ख्यात आसीद्यस्तु महासुरः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
एकचक्रा मेघरवा मेघमाला विरोचना ||
२८ ग
आदि पर्व
अध्याय
१४५
जनमेजय़ उवाच
एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
एकचक्रां ततो गत्वा प्रवृत्तिं प्रददुः परे ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
एकचक्रामभिगतः कुन्तीमाश्वासय़त्प्रभुः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
एकचक्रामभिमुखाः संवृता व्राह्मणव्रजैः ||
९८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
एकचिन्तनमर्थानामनर्थज्ञैश्च चिन्तनम् |
९७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
एकचूडा महाचूडा चक्रनेमिश्च भारत ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
एकच्छत्रा मही यस्य प्रणता ह्यभवत्पुरा |
१२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
एकच्छत्रां महीं कृत्वा कौसल्याय़ यशस्विने |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
एकच्छत्रां महीं चक्रे जैत्रेणैकरथेन यः ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
एकच्छाय़ं चक्रतुस्तावाकाशं शरवृष्टिभिः ||
४९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
एकच्छाय़मभूत्सर्वं तस्य वाणैर्महात्मनः |
८३ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
एकच्छाय़मिवाकाशं प्रकुर्वन्सर्वतः प्रभुः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
एकच्छाय़मिवाकाशं वाणैश्चक्रे समन्ततः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
एकतः श्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
गाधिरु उवाच
एकतः श्यामकर्णानां सहस्रं देहि भार्गव ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
एकतः श्यामकर्णानां हय़ानां चन्द्रवर्चसाम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
एकतःश्यामकर्णानां देय़ं मह्यं चतुःशतम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
११५
ऋचीक उवाच
एकतःश्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
एकतःश्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् |
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
एकतःश्यामकर्णानां शतान्यष्टौ ददस्व मे |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
गालव उवाच
एकतःश्यामकर्णानां शतान्यष्टौ ददस्व मे |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
एकतःश्यामकर्णानां शुभ्राणां चन्द्रवर्चसाम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
एकतःश्यामकर्णानां शुभ्राणां शुद्धजन्मनाम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
एकतःश्यामकर्णानां हय़ानां चन्द्रवर्चसाम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
४१
सूत उवाच
एकतन्त्ववशिष्टं वै वीरणस्तम्वमाश्रितान् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसंनिभाः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षय़ः |
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षय़ः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षय़ः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षय़ः ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
एकतश्च द्वितश्चैव पृष्ठतः कालय़न्पशून् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
एकतश्च महावाहुर्वहुरूपो धनञ्जय़ः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
एकतस्तु त्रय़ो वर्णा एकतः क्षत्रिय़र्षभाः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
एकतस्ते त्रय़ो राजन्गृहस्थाश्रम एकतः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
एकतस्त्वेव ते सर्वे समेता भीम एकतः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
एकतूणीशय़ः पत्री सुधौतः समलङ्कृतः ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
एकतो मृत्युमभ्येति तथाहं भीष्ममीय़िवान् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
एकतो वा कुलं कृत्स्नमात्मा वा कुलवर्धन |
२७ क