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अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
विनिवृत्ते दिनकरे प्रवृत्ते चोत्तराय़णे ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
विनिवृत्तेषु सैन्येषु पारम्पर्येण सर्वशः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
विनिवृत्तो वृतं दृष्ट्वा द्रौपद्या श्वेतवाहनम् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
विनिवृत्य जरामृत्यू न हृष्यति न शोचति ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
विनिश्चितमतिर्धीमान्वधे त्रिशिरसोऽभवत् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
विनिश्चित्याथ च ततः सन्त्यजन्तः स्वमात्मजम् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
विनिश्चेरुः प्रभा दिव्या ग्रहाणामुदय़ेष्विव ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
विनिश्चेरुः शरा दीप्ता ज्योतींषीव नभस्तलात् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
विनिष्पतद्भिः शरभैः सिंहैश्च सहसा द्रुतैः |
७६ क
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
विनिष्पिष्टानि तत्रैषां शस्त्राण्याभरणानि च |
५ क
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
विनिहत्य तमः सूर्यं यथेहाभ्युदितं तथा ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
विनिहन्तुं नरश्रेष्ठ तत्र मे शृणु कारणम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
विनिहन्मि तमश्चोग्रं मा भैः सूत स्थिरो भव ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
विनिय़ुञ्जीत राज्ये त्वां गोविन्दवचनेन च ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
विनिय़ोगं च भूतानां धातैव विदधात्युत ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
विनीतं प्रश्नय़ित्वा च व्यवस्येदात्मकर्मसु ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
विनीतकिल्विषे प्रीते हेमवर्मणि पार्थिवे |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
विनीतक्रोधहर्षा हि मन्दा वनमुपाश्रिताः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
विनीतक्रोधहर्षाणां व्राह्मणानां तपस्विनाम् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
विनीतक्रोधहर्षाश्च व्रह्मण्याः सत्यवादिनः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
विनीतजवनान्युक्तानास्थितान्युद्धदुर्मदान् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
विनीतधर्मार्थमपेतमोहं; लव्ध्वा द्विजं नुदति नृपः सपत्नान् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
विनीतमाचार्यकुले सुय़ुक्तं गुरुकर्मणि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
विनीतमोहो व्यपनीतकल्मषो; न चेह नामुत्र च योऽर्थमृच्छति ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
विनीतवदुपागम्य तस्थौ सन्दर्शनेऽग्रतः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
विनीतवदुपागम्य वाक्यं वाक्यविशारदः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
विनीतशल्यांस्तुरगांश्चतुरो हेममालिनः ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
विनीता मोक्षधर्मेषु चराम्येका मुनिव्रतम् ||
१८४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
विनीतांश्च कुलीनांश्च धर्मार्थकुशलानृजून् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
विनीतांश्च प्रगृह्णन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमाः ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
विनीतान्वृषभान्दृष्ट्वा सहदेवस्य चाभिभो ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
विनीतो निय़ताहारो व्रह्मण्यो वेदपारगः |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
विनीतोऽसि महाप्राज्ञ वृद्धानां पर्युपासिता ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
विनीय़ खलु तद्दुःखमागतं वैमनस्यजम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
विनीय़ दुःखमवला सा त्वतीवाय़तेक्षणा |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
विनेदतुस्तावतिहर्षय़ुक्तौ; गाण्डीवधन्वा च जनार्दनश्च ||
१२६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
विनेदुर्भिन्नमर्माणो निपेतुश्च गतासवः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
विनेदुर्भिन्नमर्माणो निपेतुश्च गतासवः ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
विनेदुस्तुमुलान्नादान्दुद्रुवुश्च दिशो दश ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
राजो उवाच
विनेमं पक्षिणं श्येन शरणार्थिनमागतम् ||
२० ग
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
विनेशुर्विषमे तस्मिन्ससर्पे गिरिगह्वरे ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
विन्दं तु निहतं दृष्ट्वा अनुविन्दः प्रतापवान् |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
उत्तर उवाच
विन्दवो जातरूपस्य शतं यस्मिन्निपातिताः |
२० क
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
विन्दानुविन्दावपरे राजदारांश्च सर्वशः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दाववन्त्यौ शल्यश्चैनानवारय़न् ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यावाजग्मुः संय़ुगं तदा ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्याविरावन्तमभिद्रुतौ ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्वोजं च सुदक्षिणम् |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्वोजं च सुदक्षिणम् ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्वोजश्च शकैः सह |
७ क