शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
व्रह्मणः पदमन्विच्छन्संसारान्मुच्यते शुचिः ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
व्रह्मणः पदमव्यग्रं मा ते भूदत्र संशय़ः ||
३९ ग
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
व्रह्मणः पदमाप्नोति यत्परं द्विजसत्तम ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणः पुरुषव्याघ्र तत्र कीर्तय़तः शृणु ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणः पृथिवीपाल तदा नाराय़णः स्वय़म् |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणः पृथिवीपाल पुत्रः पुत्रवतां वरः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
शक्र उवाच
व्रह्मणः सदनं यातु यस्ते हरति पुष्करम् ||
४५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
व्रह्मणः सदनं विप्र जैगीषव्यो यदाप्तवान् ||
४८ ग
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणः सदनात्तस्य परं स्थानं प्रकाशते |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
व्रह्मणः सदने तात यथा दृष्टं यथा श्रुतम् ||
१०१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
व्रह्मणः सप्त पुत्रा वै महात्मानः स्वय़म्भुवः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
व्रह्मणः सर्वभूतानि चराणि स्थावराणि च |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
व्रह्मणश्च प्रणाशेन धर्मोऽप्यनशदीश्वर |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणश्च सभां दिव्यां कथय़िष्ये गतक्लमाम् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
व्रह्मणा च प्रजाः सृष्टा गाण्डीवं च महाद्भुतम् |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्मणा त्वेवमुक्तस्तु रुद्रः क्रोधाग्निमुत्सृजन् |
६१ क
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणा निर्मितान्पूर्वं प्रेक्षमाणो मनोजवः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
व्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
मातलिरु उवाच
व्रह्मणा भरतश्रेष्ठ कालकेय़कृते कृतम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
व्रह्मणा राजशार्दूल यथापूर्वं व्यरोचत ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
व्रह्मणा लोकरक्षार्थं स्वधर्मस्थापनाय़ च |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
व्रह्मणा वरदत्तास्ता हव्यकव्यप्रदाः शुभाः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
व्रह्मणा विहिता श्रेणिरेषा यस्मात्प्रमुच्यते |
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
व्रह्मणा वै पुरा प्रोक्ताः सर्वस्य प्रिय़दर्शनाः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
व्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते नरः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणा सह संवादं त्र्यम्वकस्य विशां पते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
व्रह्मणामपि यद्व्रह्म पराणामपि यत्परम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
व्रह्मणास्मि समादिष्टो न हन्तव्यो भवानिति |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
व्रह्मणि प्रत्यतिष्ठत्स विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
व्रह्मणीं शरणं जग्मुर्दृष्ट्यर्थं तामनिन्दिताम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
व्राह्मणा ऊचुः
व्रह्मणे व्राह्मणेभ्यश्च प्रणमामि च नित्यशः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
जनक उवाच
व्रह्मणैकेन जातानां नानात्वं गोत्रतः कथम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
व्रह्मणैव स्म ते देवांस्तर्पय़न्त्यमृतैषिणः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
व्रह्मणो जुह्वतस्तत्र प्रादुर्भावो वभूव ह ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षय़ः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षय़ः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
व्रह्मणो मुखतः सृष्टो व्राह्मणो राजसत्तम |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२०८
मार्कण्डेय़ उवाच
व्रह्मणो यस्तृतीय़स्तु पुत्रः कुरुकुलोद्वह |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
व्रह्मणो वचनाद्राजन्भृगुः सप्तर्षय़स्तथा ||
२५ ग
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणो व्राह्मणानां च तथानुग्रहकाम्यया |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
व्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
व्रह्मणो हि प्रसूतोऽग्निरग्नेरपि च काञ्चनम् ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणो हृदय़ं भित्त्वा निःसृतो भगवान्भृगुः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
व्रह्मणोपचितिं कुर्वञ्जघान पुरुषोत्तमः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
व्रह्मणोपचितिं कुर्वञ्जघान मधुसूदनः ||
६४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
व्रह्मणोऽपचितिं कुर्वञ्जघान पुरुषोत्तमः ||
१२ ग
सभा पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मणोऽऽज्ञां पुरस्कृत्य हन्तुं हलधरानुजः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
व्रह्मण्य इति मामाहुस्तय़ा वाचास्मि तोषितः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
व्रह्मण्यं परमं देवमनन्तं परतोऽच्युतम् ||
९९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
व्रह्मण्यं वीर्यसम्पन्नं समरेष्वनिवर्तिनम् |
६ क