chevron_left  ततस्तत्सर्वमालोक्यarrow_drop_down
विराट पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तत्सर्वमालोक्य द्रोणो वचनमव्रवीत् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तत्सैन्यमभवद्विमुखं शरपीडितम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तथा कृतवान्पार्थिवस्तु; ततो मुनिं राजपुत्री वभाषे |
७९ क
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तथा तद्व्यदधाद्यथावत्पुरुषर्षभ |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
ततस्तथा विधातव्यं सर्वमेवाप्रमादतः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
ततस्तथेति देवेशस्तैरुक्तो राजसत्तम |
६२ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तथोक्तं पितरं रामो विज्ञाय़ वीर्यवान् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तथोक्तः परिहृष्टरूपः; पित्रे शशंसाथ स राजपुत्रः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तथोक्ता पत्या तु वाय़ुमेवाजुहाव सा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तदग्र्यं वचनं मनोनुगं; समस्तमाज्ञाय़ ततोऽतिहेतुमत् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
ततस्तदद्भुतं वाक्यं निशम्यैवं स्म सोमप |
५२ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
ततस्तदन्नं रसवत्स एव क्षुधय़ान्वितः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तदभवद्युद्धं रथिनां हस्तिभिः सह |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
ततस्तदमृतं तस्यै ददुस्ते मूढचेतसः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
ततस्तदमृतं देवो विष्णुरादाय़ वीर्यवान् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
ततस्तदर्थं यतते कर्म चारभते पुनः |
४ क
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
ततस्तदर्थं यतते कर्म चारभते महत् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तदस्त्रं मम सावशेषं; तस्मात्समर्थोऽस्मि ममैष भारः ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तदस्त्रं सहसा सृष्टं गाण्डीवधन्वना |
७ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
ततस्तदस्त्रमस्त्रेण विधूतं शरतूलवत् ||
३७ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तदा कुरुश्रेष्ठ वनस्थे त्वय़ि भारत |
११ क
वन पर्व
अध्याय १७३
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तदाज्ञाय़ मतं महात्मा; तेषां स धर्मस्य सुतो वरिष्ठः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तदाज्ञाय़ मतं महात्मा; यथावदुक्तं पुरुषोत्तमेन |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
ततस्तदिरिणं जातं समुद्रश्चापसर्पितः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
ततस्तदेव वहुशः कुण्डधारो महाय़शाः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
ततस्तदौषधीनां च वीरुधां पत्रपुष्पजम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तद्दानवं सैन्यं सर्वैर्देवगणैर्युधि |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तद्दानवानीकं सम्प्रणेतारमच्युतम् |
५३ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तद्दारुणं दृष्ट्वा क्षुभितः शङ्करस्तदा |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
ततस्तद्द्रोणपुत्रस्य तेजोऽस्त्रवलसम्भवम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
ततस्तद्धनुरादाय़ तूणौ चाक्षय़्यसाय़कौ |
४४ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तद्भवनश्रेष्ठं प्राकम्पत मुहुर्मुहुः |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नारद उवाच
ततस्तद्भावितो नित्यं यजे वैकुण्ठमव्ययम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तद्युद्धमत्युग्रमभवत्सङ्घचारिणाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तद्रूपमुत्सृज्य वभौ निस्त्रिंश एव सः |
४३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
ततस्तद्रूपवय़समागतं नृपतिं दिवः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युत्थाय़ कृताञ्जली |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तद्वचनं श्रुत्वा शिशुपालः प्रतापवान् |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तद्वचनान्मत्स्यो दूतान्राजा समादिशत् |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
ततस्तद्वचनान्मय़ा तदृषभस्य पुरीषमुपय़ुक्तम् |
१७१ 6
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
ततस्तद्वस्त्रमरजः प्रावृणोद्वसुधाधिपः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
ततस्तद्वाणवर्षं तु दुःसहं दानवैरपि |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तद्विततं जालं हस्त्यश्वरथपत्तिमत् |
७ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तद्विद्रुतं सैन्यमपय़ाते जय़द्रथे |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
ततस्तद्विमुखं दृष्ट्वा तव सूनोर्महद्वलम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तन्मतमाज्ञाय़ केशवस्य पुरःसराः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तन्मतमाज्ञाय़ सञ्जय़स्यात्मजस्य च |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
वासुदेव उवाच
ततस्तपसि तस्याथ पुनः प्रादुर्भवाम्यहम् ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
ततस्तपोवने तस्मिन्समाजग्मुस्तपोधनाः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
ततस्तमः प्रादुरभूदर्जुनस्य रथं प्रति |
२३ क