शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
त्रैविद्यवृद्धाः शुचय़ो वृत्तवन्तो यशस्विनः |
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा; यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थय़न्ते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
त्रैविद्यानां या गतिर्व्राह्मणानां; यश्चैवोक्तोऽथाश्रमो व्राह्मणानाम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५५
भीष्म उवाच
त्रैविद्येभ्यः परं नास्ति संन्यासः परमं तपः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
त्रैविद्यो व्राह्मणो विद्वान्न चाध्ययनजीवनः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
त्रैशीर्षय़ाभिभूतश्च स पूर्वं व्रह्महत्यया ||
४२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
त्रैस्वर्येण तु सर्वत्र स्थितोऽपि पटहादिषु ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
द्रोण उवाच
त्रैय़म्वकमथेष्वस्त्रमस्त्राणि विविधानि च ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
त्र्यक्षं चतुर्भुजं श्रुत्वा तथा च समुदाहृतम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
त्र्यक्षं महाभुजं रुद्रं शिखिनं चीरवाससम् |
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
त्र्यक्ष्णे पूष्णो दन्तभिदे वामनाय़ शिवाय़ च ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
त्र्यङ्गाः केकरकाः प्रोष्ठाः परसञ्चरकास्तथा |
६० क
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
त्र्यम्वकं शिवमुग्रेशं वहुरूपमुमापतिम् ||
११ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
त्र्यम्वकः सवितुर्वाहू भगस्य नय़ने तथा |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
त्र्यम्वकेणाभ्यनुज्ञातास्ततस्तेऽस्वस्थचेतसः |
४४ क
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
त्र्यम्वको राजशार्दूल देवी च विगतक्लमा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
त्र्यवदाते कुले जातस्त्रिसन्देहस्त्रिकर्मकृत् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
त्र्यहमुष्णं घृतं पीत्वा वाय़ुभक्षो भवेत्त्र्यहम् ||
७१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
त्र्यहमुष्णं घृतं पीत्वा वाय़ुभक्षो भवेत्त्र्यहम् ||
३६ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
त्र्यहमुष्णं पिवेन्मूत्रं त्र्यहमुष्णं पिवेत्पय़ः |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
त्रय़ एते महानागा राक्षसैः समधिष्ठिताः ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
त्रय़ एते महामात्राः पाण्डुरच्छत्रवाससः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
त्रय़ एतेऽपृथग्भूता नविवेकं तु केचन ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७७
शर्मिष्ठो उवाच
त्रय़ एवाधना राजन्भार्या दासस्तथा सुतः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
त्रय़ एवाधना राजन्भार्या दासस्तथा सुतः |
५७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
त्रय़ः किल रथाः शिष्टास्तावकानां नराधिप |
४६ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
कर्ण उवाच
त्रय़ः किलेमे अधना भवन्ति; दासः शिष्यश्चास्वतन्त्रा च नारी |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
त्रय़ः प्रजज्ञिरे पुत्रा देवकल्पा यशस्विनः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ः शव्दा न जीर्यन्ते दिलीपस्य निवेशने |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
त्रय़मेतत्पृथग्भूतमविवेकं तु केचन ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
त्रय़श्च तुरगास्तज्ज्ञैः पत्तिरित्यभिधीय़ते ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़स्तस्य वराः पुत्राः सर्वभूतमनोहराः |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
द्रौपद्यु उवाच
त्रय़स्तु राज्ञो राजेन्द्र व्राह्मणस्य शतं वराः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
त्रय़स्ते दैत्यराजानस्त्रीँल्लोकानाशु तेजसा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
त्रय़स्त्रिंशच्च देवानां सृष्टिः सङ्क्षेपलक्षणा ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़स्त्रिंशत इत्येते देवास्तेषामहं तव |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
त्रय़स्त्रिंशत्समाहूय़ खाण्डवेऽग्निमतर्पय़त् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
त्रय़स्त्रिंशत्सहस्राणि त्रय़स्त्रिंशच्छतानि च |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
त्रय़स्त्रिंशत्सहस्राणि योजनानां हिरण्मय़ः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
त्रय़स्त्रिंशदिमे लोकाः शेषा लोका मनीषिभिः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रय़स्त्रिंशद्यथा देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
त्रय़स्त्रय़ाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
त्रय़स्त्रय़ाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़स्त्वङ्गिरसः पुत्रा लोके सर्वत्र विश्रुताः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
त्रय़स्य सञ्चय़े चास्य ज्ञातीन्पुत्रांश्च धारय़ेत् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रय़ाणां केन ते राजन्योद्धुं वितरते मनः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
त्रय़ाणां चैव लोकानां सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
त्रय़ाणां तव पुत्राणां त्रय़ एवानुय़ाय़िनः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
त्रय़ाणां पावकानां स सत्रे तस्मिन्महामुनिः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
त्रय़ाणां मिथुनं सर्वमेकैकस्य पृथक्पृथक् ||
२६ ख