वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
विभीषणाय़ प्रददौ प्रभुः परपुरञ्जय़ः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
विभीषणेनानुगतः सुग्रीवसहितस्तदा |
५६ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
विभीषिकाभिर्वह्वीभिर्भीषय़न्सर्वपार्थिवान् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
विभीषिकैषा गन्धर्व नास्त्रज्ञेषु प्रय़ुज्यते |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
विभीषय़ंस्तव सुतांस्तव सेनां समभ्ययात् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
विभीषय़न्निव जगत्पाण्डवानभ्यवर्तत ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
विभीस्ततस्तदस्त्रं तु घोरं रौद्रं सनातनम् |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
विभीस्तस्थौ महाराज व्यवस्थाप्य च वाहिनीम् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
विभुर्भूरभिभूः कृष्णः कृष्णवर्त्मा त्वमेव च ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
विभुस्त्यजति चाव्यक्तं यदा त्वेतद्विवुध्यते |
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
विभूषणमिवैतेषां भूषणानामभीप्सितम् ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
विभूषितं पुण्यपवित्रतोय़या; सदा च जुष्टं नृप जह्नुकन्यया |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
विभृय़ाद्युवतिः श्यामा तद्वदासीद्वसुन्धरा |
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६
सूत उवाच
विभेति को न शापान्मे कस्य चाय़ं व्यतिक्रमः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
विभेति राजा सुश्रोणि गन्धर्वेभ्यः पराभवात् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
विभेति हि यथा शक्रो व्रह्मचारिप्रधर्षितः |
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
विभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामय़ं प्रतरिष्यति ||
२०४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६
द्रुपद उवाच
विभेत्स्यति मनांस्येषामिति मे नात्र संशय़ः ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
विभेद कवचं राज्ञो रणे कर्णः शितैः शरैः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
विभेद च महाराज पार्श्वं तस्य महात्मनः ||
१२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
विभेद च सुसंहृष्टः पुनश्चैनान्सुसंशितैः |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
विभेद चैवाशनितुल्यतेजसा; गदानिपातेन शरीररक्षणम् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
विभेद तरसा गङ्गा गङ्गाद्वारे युधिष्ठिर |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
विभेद दक्षिणं वाहुं क्षत्रदेवस्य चाहवे |
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
विभेद दुर्भिदं सङ्ख्ये चक्रव्यूहमनेकधा ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
विभेद पार्थः स पपात नानद; न्हिमाद्रिकूटः कुलिशाहतो यथा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
विभेद राजन्वज्रेण भुवि तन्निपपात ह ||
१३ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
विभेद शक्त्या क्रौञ्चं च पावकिः परवीरहा ||
७९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
विभेद शतधा राजञ्शरीराणि महीक्षिताम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
विभेद शालं सुग्रीवो न चैवाव्यथय़त्कपिः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
विभेद शिखरं घोरं श्वेतस्य तरसा गिरेः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
विभेद स शरैः शैलं क्रौञ्चं हिमवतः सुतम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
विभेद सन्धिं देहस्य जरय़ा श्लेषितस्य ह ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
विभेद समरे क्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
विभेद समरे वीरः प्रेक्ष्य भीष्मं महाव्रतम् ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
विभेद सर्वगात्रेषु पुनः पुनररिन्दमः ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विभेद हृदि वाणेन पृथुधारेण पाण्डवः ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
विभेद हृदय़ं पत्री स पपात मुमोह च ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
विभेद हृदय़ं राज्ञो भगदत्तस्य पाण्डवः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
विभेदाशु तदा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
विभेदोरगसङ्काशैर्नाराचैः शिनिपुङ्गवः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
विभेदोरसि विक्रम्य स रथोपस्थ आविशत् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
मनुरु उवाच
विभेमि कर्मणः क्रूराद्राज्यं हि भृशदुष्करम् |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
विभेमि कुन्त्या या नाहं युष्माकं वा कदाचन |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
विभेमि तपसः साधो प्रसादं कुरु मे विभो ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८६
कर्ण उवाच
विभेमि न तथा मृत्योर्यथा विभ्येऽनृतादहम् |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
विभेमि नाहमेतेषां जानामि त्वां स्थिरं युधि |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
विभेमि भीष्मात्सुश्रोणि त्वं च भीष्मपरिग्रहः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
विभेम्यस्याः परिभवान्नारीणां गतिरीदृशी ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
विभेम्यहमधर्मस्य धर्म्यमादिश कर्म मे |
३ क