वन पर्व
अध्याय
१९०
मार्कण्डेय़ उवाच
विभेषि चेत्त्वमधर्मान्नरेन्द्र; प्रय़च्छ मे शीघ्रमेवाद्य वाम्यौ |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्यतोऽनुपरागस्य कामक्रोधौ स्म वर्धितौ ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
विभ्रंशश्चैव मन्त्रस्य सिद्ध्यसिद्ध्योश्च यत्फलम् ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
विभ्रंशिता त्वय़ा हीय़ं धर्मावाप्तेः परावरात् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
विभ्रच्चानिय़तं वेषमुन्मत्त इव पाण्डव |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
विभ्रतं गार्दभं रूपमादिश्य परिगर्हसे ||
२३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्रतः कवचान्यन्ये विमलान्याय़ुधानि च |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्रतः क्षात्रमोजश्च व्राह्मण्यं प्रतिजानथ ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
विभ्रती कलशं रौक्मं सर्वतीर्थजलोद्भवम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
विभ्रती परमं रूपं जगामाथ विहाय़सा ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्रती परमं रूपं रमय़ामास पाण्डवम् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
विभ्रतो हेममालाश्च चक्रवाकोदरा हय़ाः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्रत्कृष्णाजिनं वासो हेमप्रवरतारकम् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
विभ्रत्पितुश्च कौरव्य रूपवर्णमनुत्तमम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
विभ्रत्सखड्गः सशरो धनुष्मान्विनदन्मुहुः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्रत्साधून्महाराज जय़ लोकाञ्जितेन्द्रिय़ः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
सत्यवानु उवाच
विभ्रद्दण्डाजिनं मुण्डो व्राह्मणोऽर्हति वाससम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
विभ्रद्भीमो महाराज न जगाम व्यथां रणे ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
विभ्रद्रूपं महाराज सदृशं हि गरुत्मतः ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
विभ्रद्वपुरनिर्देश्यं किरीटी लोहिताङ्गदः |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्रद्व्राह्मीं श्रिय़ं दीप्तां देवैरिव वृहस्पतिः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५७
भीष्म उवाच
विभ्रमाल्लोकवाह्यानां द्वेष्यैर्वाक्यैरसङ्गतैः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६९
धृतराष्ट्र उवाच
विभ्राजमानं वपुषा परेण; प्रकाशय़न्तं प्रदिशो दिशश्च ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
विभ्राजमाना दृश्यन्ते मेघा इव सविद्युतः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्राजमाना वपुषा विभ्रती रूपमुत्तमम् ||
९२ ख
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
विभ्राजमाना वपुसा व्यवर्धत शुभानना ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्राजमानां वपुषा तपसा च दमेन च |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्राजमानां वपुषा विभ्रतीं रूपमुत्तमम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्राजमानाविव चन्द्रसूर्यौ; वाह्यां पुराद्भार्गवकर्मशालाम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्राजमानो वपुषा गिरिर्मेरुरिवापरः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
विभ्राजेतां यथा शैलौ नीहारेणाभिसंवृतौ ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
विभ्रान्तं प्रेक्ष्य राधेय़ं सूतपुत्रं महाहवे |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
विमथ्यतो देवमहासुरौघै; र्यथार्णवस्यादिय़ुगे तदानीम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
विमथ्यातिक्रमेरंश्च विषह्यापि परस्परम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
विमदान्रथशार्दूलान्कुरुते रणमूर्धनि ||
२५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
विमन्युर्गतसंरम्भः कुरु कर्म नृपस्य हि |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
विमर्दः कर्णभीमाभ्यामासीच्च परमो रणे ||
२६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
विमर्दः सुमहानासीत्तस्य सैन्यस्य मारिष |
३१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
विमर्दः सुमहानासीदनय़ान्मत्कृतादथ ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
विमर्दः सुमहानासीदल्पानां वहुभिः सह |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
विमर्दः सुमहान्प्राप्तस्त्वय़ा यादवनन्दन ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
विमर्दः सुमहान्भावी मांसशोणितकर्दमः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
विमर्दः सूतपुत्रस्य भीमस्य च विशां पते ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
विमर्दस्तु महानासीदर्जुनस्य परैः सह |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
विमर्दस्ते महावाहो व्यपय़ाहि रणादितः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
विमर्शं सङ्करादाने नाय़ं कुर्यात्कथञ्चन ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
विमलं खड्गमादत्त शतचन्द्रं च भानुमत् ||
१३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
विमलप्रासहस्तानामृष्टितोमरधारिणाम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
विमलस्तीक्ष्णधारश्च कालान्तक इवोद्यतः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
विमलस्फटिकाभानि पाण्डुरच्छदनैर्द्विजैः |
६६ क