आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
वनं जगाम गहनं हय़नागशतैर्वृतः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
वनं तदेव निर्याता क्रीडार्थं वरवर्णिनी ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
वनं तस्मादिदं तस्य नामास्तीकेति विश्रुतम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
वनं तु प्रस्थितं रामं भरद्वाजसुतोऽव्रवीत् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
वनं तु प्रस्थितं रामं भारद्वाजस्तदाव्रवीत् |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
वनं दुर्गं हि यत्त्वेतत्संसारगहनं हि तत् ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
वनं दुर्गमनुप्राप्तो महत्क्रव्यादसङ्कुलम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
सत्यवानु उवाच
वनं न गतपूर्वं ते दुःखः पन्थाश्च भामिनि |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
वनं पाण्डुसुतः श्रीमाञ्शव्देनापूरय़न्दिशः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
वनं पुण्ययशःकर्मा जरावान्संश्रय़िष्यति ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
वनं प्रतस्थे धर्मात्मा राजा सत्यो भवत्विति ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
वनं प्रतिभय़ं घोरं शार्दूलमृगसेवितम् ||
८३ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
वृहदश्व उवाच
वनं प्रतिभय़ं शून्यं झिल्लिकागणनादितम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
वनं प्रतिभय़ाकारं घनेन तमसा वृतम् |
७५ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
वनं प्रविविशू राजंस्तापस्ये कृतनिश्चय़ाः ||
७२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
नारद उवाच
वनं प्रविशता तेन वाय़ुभक्षेण धीमता |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
वनं प्रविश्य सुमहत्तप आरव्धवांस्तदा ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
जनमेजय़ उवाच
वनं प्रविष्टस्तेजस्वी निर्मनुष्यमभीतवत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु; प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्विकेय़ः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
वनं प्रवेक्ष्ये विप्रेन्द्रा विभजध्वं महीमिमाम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
वनं प्रव्राजितान्पार्थान्यदाय़ान्मधुसूदनः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
वनं प्रव्राजिताश्चास्म वल्कलाजिनवाससः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
वनं प्रस्थाप्य दुष्टात्मा नान्वतप्यत दुर्मतिः ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
वनं प्रस्थापय़ामास भ्रातरं वै धनञ्जय़म् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
वनं प्रस्थापय़ामास सप्त वर्षाणि पञ्च च |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
वनं यास्यामि गोविन्द श्रेय़ो मे तत्र जीवितुम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
वनं यास्यामि दुर्धर्ष श्रेय़ो मे तत्र वै गतम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
वनं यिय़ासतां विप्रास्तस्थुर्भिक्षाभुजोऽग्रतः |
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
वनं यय़ौ ततो विप्रो ददृशुर्दानवाश्च तम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
वनं यय़ौ सत्यवती स्नुषाभ्यां सह भारत ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
वनं राजंस्त्वं सपुत्रोऽम्विकेय़; सिंहान्वने पाण्डवांस्तात विद्धि |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
वनं राजा धृतराष्ट्रः सपुत्रो; व्याघ्रा वने सञ्जय़ पाण्डवेय़ाः |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
वनं वनजपत्राक्षीं भ्रमन्नुन्मत्तवत्तदा ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
वनं विरहितं किञ्चित्तत्रापश्यत्स नारदम् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
वनं सम्प्रस्थितं राजन्वृहदश्वं द्विजोत्तमः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
वनं हि रक्ष्यते व्याघ्रैर्व्याघ्रान्रक्षति काननम् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
वनगुल्मांश्च धावन्तो निद्रान्धा महतो भय़ात् |
८ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
वनगुल्माद्विनिष्क्रम्य शोचन्तो वैशसं कृतम् |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
वनचर्या च निःसङ्गा निर्भय़ा निरवग्रहा ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
वनदाहो गवामर्थे क्रिय़माणो न दूषकः ||
३१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
वननित्यैर्वनचरैर्वनपैर्वनगोचरैः |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
वनमध्ये च तत्राभूदुदपानः समावृतः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
वनमभ्यागतो घोरमिदं तव परिग्रहम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
वनमादाय़ भद्रं ते गच्छावो यदि मन्यसे ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
वनमादीपय़िष्यामि कुरूणामस्त्रतेजसा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
वनमामन्त्र्य वः सर्वान्गमिष्यामि परन्तप ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
वनमाली ततः क्षीवः कैलासशिखरोपमः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
वनमाली ततो हृष्टः स्तूय़मानो द्विजातिभिः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
वनमाली हली रामस्तत्र यत्र जनार्दनः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
वनमाली हली रामो वभाषे पुष्करेक्षणम् ||
४ ख