आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४०
व्रह्मो उवाच
विमुक्ताः सर्व एवैते महत्त्वमुपय़ान्ति वै ||
७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः क्षान्ता विगतकल्मषाः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
विमुक्ताः सर्वपापेभ्यश्चरन्ति शुचय़ोऽमलाः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
विमुक्ताः सर्वपापैश्च चरन्ति मुनय़ो वने ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तानां शरीराणां भिन्नानां पततां भुवि |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
विमुक्तान्सम्प्रपश्यामि तस्माद्युद्धादमानुषात् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
विमुक्ताश्च नरव्याघ्रा भागधेय़पुरस्कृताः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
विमुक्तेन व्यतीतेन भीमसेन महावल |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
विमुक्तो मुक्ततेजाश्च श्रीमाञ्श्रीवर्धनो जगत् |
१५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तो मेघजालेन यथैव तपनस्तथा ||
५१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४३
आस्तीक उवाच
विमुक्तो हृदय़ग्रन्थिरुदारजनदर्शनात् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तौ च महात्मानौ दृष्ट्वा द्रौणिः सुदुःखितः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
विमुक्तौ जनसम्वाधाच्छत्रुभिः परिविक्षतौ |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तौ ज्वलनस्पर्शान्मकरास्याज्झषाविव |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तौ मेघजालेन शशिसूर्यौ यथा दिवि ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तौ शस्त्रसम्वाधाद्द्रोणानीकात्सुदुर्भिदात् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तय़न्त्रैर्निहतैरय़स्मय़ै; र्हतानुषङ्गैर्विनिषङ्गवन्धुरैः |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तय़ुग्यकवचा हर्षेण च समन्विताः |
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
विमुखं च ततो रक्षो वध्यमानं रणेऽरिणा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
विमुखं चैनमालोक्य माद्रीपुत्रौ महारथौ |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
विमुखं तं रणे दृष्ट्वा याज्ञसेनिं महारथम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
विमुखं नकुलश्चक्रे तत्सैन्याः समपूजय़न् ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
विमुखं हतसूतं तं भीमः प्रहरतां वरः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
विमुखांश्चैव तान्दृष्ट्वा द्रौणिचापच्युतैः शरैः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
विमुखाः पृष्ठतश्चान्ये ताड्यन्ते पार्श्वतोऽपरे ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
विमुखाः समपद्यन्त शरवृष्टिभिरर्दिताः ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
सञ्जय़ उवाच
विमुखानि च सैन्यानि हतं दृष्ट्वा घटोत्कचम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
विमुखाश्चाभ्यधावन्त तव योधाः समन्ततः |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
विमुखीकृत्य कर्णं तु सौभद्रः कङ्कपत्रिभिः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
विमुखीकृत्य तान्सर्वांस्तावकान्युधि राक्षसः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
विमुखीकृत्य तान्सर्वाञ्शरैः संनतपर्वभिः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
विमुखीकृत्य पुत्रं ते तव सेनां ममर्द ह ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
विमुखीकृत्य सौभद्रः सिंहनादमथानदत् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
विमुखे तव पुत्रे तु शोकोपहतचेतसि |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
विमुखेषु महाप्राज्ञ मम पुत्रेषु सञ्जय़ ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
विमुखो विनिवर्तेय़ं पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
विमुच्य कम्वू परिहाटके शुभे; विमुच्य वेणीमपिनह्य कुण्डले ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
विमुच्य कवचं कृष्ण शरीरमभिवीक्षते ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
विमुच्य कवचं वीरो निक्षिप्य च वराय़ुधम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
विमुच्य कवचानन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
विमुच्य कवचानन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
विमुच्य कृष्णां सन्त्रस्तः पलाय़नपरोऽभवत् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
विमुच्य गुरुपत्नीं तु विपुलः सुमहातपाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
विमुच्य देहान्वै भान्ति मृत्योरविषय़ं गताः ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
विमुच्य द्रौपदीं तत्र प्राद्रवन्नगरं प्रति ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
विमुच्य निर्ममः शान्तो व्रह्मभूय़ाय़ कल्पते ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
विमुच्य पथि यानानि देशे सुय़वसोदके |
७ क
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
विमुच्य मां गतः पापः स ततोऽहमिहागतः |
२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
विमुच्य वाहांस्त्वरिता भीताः समभवंस्तदा |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
विमुच्य वाहानवरुह्य सर्वे; तत्रोपतस्थुर्भरतप्रवर्हाः ||
२५ ख