आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
इत्युक्त्वा तानुपादाय़ सक्तून्प्रादाद्द्विजातय़े |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा तामनिन्द्याङ्गीं स राक्षसगणेश्वरः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
इत्युक्त्वा तामुपादाय़ स्वमेव भवनं यय़ौ ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा तु ततो गाधिर्विश्वामित्रं निवेश्य च |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा तु महात्मानं पितरं व्रह्मवित्तमम् |
१० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा तु समुत्सृज्य सहदेवं यय़ौ तदा |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा ते जग्मुराशु चत्वारोऽमिततेजसः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
इत्युक्त्वा ते तदा देवा ऋषिभिः सह भारत |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा ते महात्मानः सर्वे तत्त्वार्थदर्शिनः |
४८ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा दारुकमिदं वाक्यमाह धनञ्जय़ः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
इत्युक्त्वा दिवमाक्रम्य क्षिप्रमन्तरधीय़त |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा दुःखशोकार्तः शुचिर्धर्मसुतस्तदा |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
उमो उवाच
इत्युक्त्वा देवदेवस्य पत्नी धर्मभृतां वरा |
१८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
इत्युक्त्वा द्रौणिरास्थाय़ तां वेदीं दीप्तपावकाम् |
५८ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजः स वासुदेवस्य धीमतः |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजानं वेपमानः कृताञ्जलिम् |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजानमभ्यभाषत कौरवः ||
१३ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजाय़ प्रेषय़ामास पार्थिवः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
इत्युक्त्वा धृतराष्ट्रोऽथ विलप्य वहुदुःखितः |
१६० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा नकुलः सर्वान्यज्ञे द्विजवरांस्तदा |
९० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
इत्युक्त्वा निःसृतोऽश्वत्थादग्निर्वारणसूचितः |
३५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा न्यपतद्भूमौ गान्धारी शोककर्शिता |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा पन्नगसुतां सपत्नीं चैत्रवाहिनी |
१८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा पाण्डवं कृष्णा राजानं चारुदर्शना |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा पाण्डवं व्यासस्तत्रैवान्तरधीय़त ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा पाण्डवः क्रुद्धो गन्धर्वाय़ मुमोच ह |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा पाण्डवो राजा युय़ुधानवृकोदरौ |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा पितृराजस्तां भगवान्स्वं चिकीर्षितम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा पुण्डरीकाक्ष प्रतिज्ञां स्वां न रक्षसि ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
इत्युक्त्वा पुनरेवाग्निमनुसस्रुर्दिवौकसः ||
३७ ग
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
इत्युक्त्वा प्रददावस्मै दिव्यं वासोय़ुगं तदा ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा प्रस्थितान्हंसान्दक्षिणामभितो दिशम् |
९५ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा प्रस्थितो राजा भीमोऽथ निपपात ह |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा प्राद्रवत्कृष्णा सुदेष्णाय़ा निवेशनम् |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा प्राद्रवद्भीतो रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा प्रारुदत्कृष्णा भीमस्योरः समाश्रिता |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा प्रारुदत्कृष्णा मुखं प्रच्छाद्य पाणिना |
१०९ क
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा प्रारुदत्सीता कम्पय़न्ती पय़ोधरौ |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा प्राविशत्क्रुद्धो द्रोणानीकं वृकोदरः |
४६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा प्राविशद्द्रौणिः पार्थानां शिविरं महत् |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा प्राविशद्राजा गान्धार्या भवनं तदा ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा प्राहरत्तूर्णं पाण्डुपुत्राय़ सूतजः |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
इत्युक्त्वा प्रय़यौ तत्र पिता यत्रास्य सोऽभवत् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
इत्युक्त्वा प्रय़यौ राजा तस्थौ च द्विजसत्तमः ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा प्रय़यौ राजा सह क्षत्त्रा युधिष्ठिरः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा प्रय़यौ राजा सैन्येन महता वृतः |
६० क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा फल्गुनं शक्रो जगामादर्शनं ततः |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा भगवान्देवः सहस्राक्षः प्रतापवान् |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा भगवान्देवो यक्षराक्षसपूजितः |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा भगवान्व्यासस्तथा प्रतिविधाय़ च |
२३ क