आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्ता च धर्मार्थविदग्र्यवुद्धिः; ससञ्जय़स्तं नृपतिं सदारम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्ता चैव पटुप्रज्ञो यो नः शंसति सर्वदा ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
धृतराष्ट्र उवाच
क्षत्ता मन्त्री महाप्राज्ञः स्थितो यस्यास्मि शासने |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्ता यदव्रवीद्वाक्यं जनमध्येऽव्रुवन्निव |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्ता व्ययकरस्त्वासीद्विदुरः सर्वधर्मवित् |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्ता ह्ययं विवदत्येव भीरु; र्न चास्माकं वृद्धिकामः सदैव ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्तारं कुरुराजस्तु शनैः कर्ण उपाजपत् |
५२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्तारं चापि सम्पूज्य पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
क्षत्तारं नेह मे कश्चिदज्ञातः प्रविशेदिति ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३०
दुर्योधन उवाच
क्षत्तार्थवद्धस्त्वस्माकं प्रच्छन्नं तु यतः परे |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
क्षत्तुः प्रज्ञां धृतिं कुन्त्याः सम्यग्द्वैपाय़नोऽव्रवीत् ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्तुः शीलमलङ्कारो लोकान्विष्टभ्य तिष्ठति ||
५३ ख
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्तुः सम्प्रेषय़ामास शीघ्रमागम्यतामिति ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्तुराचष्ट दाशार्हः सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्तुरेकस्य भोक्तव्यमिति मे धीय़ते मतिः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्तुर्यदा अन्ववर्तन्त वुद्धिं; कृच्छ्रं कुरून्न तदाभ्याजगाम |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
क्षत्तुर्वाक्यमनादृत्य त्वय़ाभ्यस्तः पुनः पुनः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
क्षत्रं च व्राह्मणं द्वेष्टि तदा शाम्यन्ति ते त्रय़ः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रं चाग्निसमस्पर्शं भारद्वाजेन रक्षितम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रं चान्येऽभ्यनिन्दन्त भीष्मं चैकेऽभ्यपूजय़न् ||
११० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
क्षत्रं चोत्सादय़िष्यामि समृद्धवलवाहनम् ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रं याति तथा स्वर्गं भुवि निग्रहपालनैः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रं स्वर्गं कथं गच्छेच्छस्त्रपूतमिति प्रभो |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
क्षत्रं हि दैवतमिव व्राह्मणं समुपाश्रितम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७४
कश्यप उवाच
क्षत्रं हि व्रह्मणो योनिर्योनिः क्षत्रस्य च द्विजाः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंमतः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
क्षत्रजातिरथाम्वष्ठा उग्रा वैदेहकास्तथा |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रञ्जय़ः क्षत्रदेवः क्षत्रधर्मा च मानिनः |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
क्षत्रतेजा व्रह्मचारी कौमारादपि पाण्डवः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रदेवं तु भल्लेन रथनीडादपाहरत् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रदेवश्च विक्रान्तः क्षत्रधर्मा तथैव च ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
क्षत्रदेवस्तु राजेन्द्र पाण्डवेषु रथोत्तमः |
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्रधर्मं च धिग्यस्मान्मृता जीवामहे वय़म् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य आत्मनश्चाभिमानिताम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य गतः शूरः सतां गतिम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य जहि मद्रजनेश्वरम् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य ततस्त्वा विनिय़ुज्महे ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य पार्थो वा गुरुमाहवे ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य प्रत्युद्याहि धनञ्जय़म् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य विनय़ं श्रुतमेव च ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य सर्व एव गतज्वराः |
५१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं विदित्वाहं यदि व्राह्मण्यसंश्रितम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं समास्थाय़ नवभिः साय़कैः पुनः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मं समास्थाय़ व्यपेतभय़सम्भ्रमः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मं समुत्सृज्य पलाय़नपराय़णाः ||
६६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मः किल रणे तनुत्यागोऽभिपूजितः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मः पुरा दृष्टो यस्तु देवैर्महात्मभिः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
क्षत्रधर्मजिताँल्लोकान्सम्प्राप्स्यसि न संशय़ः ||
३१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
क्षत्रधर्मपराः सन्तस्तथा हि निधनं गताः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
क्षत्रधर्मप्रशस्तां हि प्राप्तोऽस्मि परमां गतिम् ||
५३ ख