chevron_left  व्यधमत्तान्यनीकानिarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्तान्यनीकानि तथैव पवनात्मजः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्तान्यनीकानि तूलराशिमिवानिलः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्त्वरय़ा युक्तः क्षपय़न्सर्वपार्थिवान् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्पाण्डवानीकमभ्राणीव सदागतिः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्पाण्डवीं सेनां तूलराशिमिवानलः ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्पाण्डवीं सेनामासुरीं मघवानिव |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्पाण्डवो वाणैस्तमः सूर्य इवांशुभिः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्स गजानीकं गदय़ा पाण्डवर्षभः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्स महातेजा महाभ्राणीव मारुतः ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्समरे राजन्महाभ्राणीव मारुतः ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्सर्वपाञ्चालांस्तूलराशिमिवानलः ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्सहसा भीमः क्रुद्धरूपः परन्तपः ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यधमत्साय़कैर्भीष्मो अर्जुनं संनिवारय़त् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्साय़कैस्तूर्णं तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
व्यधमद्द्रोणतनय़ो नीलमेघं समुत्थितम् ||
७२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
व्यधमद्द्विषतः सङ्ख्ये खगराडिव पन्नगान् |
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
व्यधमद्भरतश्रेष्ठो नीहारमिव मारुतः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
व्यधमद्भीमसेनस्य शरजालानि पत्रिभिः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
व्यधमद्रोषताम्राक्षो वाय़व्यास्त्रेण भारत ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यधमन्न च पार्थोऽस्य शरीरमवपीडय़त् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
व्यधमन्निशितैर्वाणैः क्षिप्रमर्जुनमारुतः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
व्यधमन्निशितैर्वाणैः शतशोऽथ सहस्रशः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
व्यधमल्लाघवात्तच्च ददृशे नास्य कश्चन ||
६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
व्यधमेतां शितैस्तूर्णं शरैः संनतपर्वभिः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
व्यध्वंसय़न्नर्जुनवाहुमुक्ताः; शराः समासाद्य दिशः शिताग्राः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
व्यनदंश्च महाकाय़ा दैत्या जलधरोपमाः |
५९ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
व्यनदज्जातमात्रो हि गोमाय़ुरिव भारत |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
व्यनदत्सुमहानादं जीमूत इव शारदः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
व्यनदत्सुमहानादं भैमसेनिर्घटोत्कचः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
व्यनादय़त्स प्रदिशो दिशः खं; भुवं च पार्थो द्विषतां निहन्ता ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
व्यनाशय़न्त मर्यादा दानवा दुष्टचारिणः ||
३० ग
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
व्यनिन्दन्त ततः सर्वे योधास्तत्र विशां पते |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
व्यनिन्दन्भृशमात्मानं तव पुत्रांश्च सङ्गतान् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
व्यपत्रपन्मनुष्याणां मृग्यां मैथुनमाचरम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
अष्टावक्र उवाच
व्यपदिश्य महर्षेर्वै शय़नं चाध्यरोहत ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
व्यपनीतोऽद्य मन्युर्मे यस्त्वां प्रति पुरा कृतः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
व्यपनेष्यामि ते दर्पं पौराणं व्राह्मणव्रुव ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
व्यपनेष्यामि ते दर्पं युद्धे राम न संशय़ः ||
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
व्यपनेष्यामि ते मन्युं सर्वय़त्नैर्नराधिप ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
व्यपनेष्याम्यहं ह्येनं मा राजन्विमना भव ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
व्यपनय़ति विमार्गं नास्ति दैवे प्रभुत्वं; गुरुमिव कृतमग्र्यं कर्म संय़ाति दैवम् |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपविद्धं हतस्येह मय़ा पुत्रेण पश्यत ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
व्यपसृत्य तु नागाभ्यां मण्डलानि विचेरतुः |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपाहरच्छिरः क्रुद्धश्चक्रेणामित्रकर्षणः |
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
व्यपाय़ात्सवलस्तूर्णं प्रद्युम्नशरपीडितः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
व्यपेतजलदे व्योम्नि वुधभार्गवय़ोरिव ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
व्यपेततन्द्रो धर्मात्मा शक्या सत्पथमाश्रितः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
श्रीभगवानु उवाच
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं; तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
व्यपेतभीरमित्राणामावहत्सुमहद्भय़म् |
५२ ख
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
व्यपेतभीर्गिरिं शौर्याद्भीमसेनो व्यगाहत ||
२१ ख