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उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
विवर्जय़ीत मेधावी तस्मिन्मैत्री प्रणश्यति ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
विवर्णमुखभूय़िष्ठमभवत्तावकं वलम् ||
४५ ग
विराट पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
विवर्णमुखभूय़िष्ठाः सर्वे योधा विचेतसः |
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४०
सूत उवाच
विवर्णवदनाः सर्वे रुरुदुर्भृशदुःखिताः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
विवर्णवदनाश्चासन्गतश्रीकाश्च भारत |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
भीष्म उवाच
विवर्णो वर्णमाश्रित्य देहेषु परिवर्तते ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
विवर्तमानं वहुशो रुधिरौघपरिप्लुतम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
विवर्तय़ैनं च महाद्रिराजं; वलं च वीर्यं च तवाप्रमेय़म् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
विवर्धन्ते तु दशमीं गावः श्राद्धानि कुर्वतः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
विवर्धमानः सर्वांस्तान्पन्नगानभ्यहर्षय़त् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
विवर्धमानमालक्ष्य तदस्त्रं भीमविक्रमम् |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
विवर्धमानस्त्रिशिराः सर्वं त्रिभुवनं ग्रसेत् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८३
पराशर उवाच
विवर्धमानाः क्रमशस्तत्र तेऽन्वाविशन्प्रजाः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
विवर्धमानास्ते तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
विवर्धितश्च ऋषिभिर्हव्यैः कव्यैश्च भामिनि |
२ क
वन पर्व
अध्याय २४४
वैशम्पाय़न उवाच
विवर्धेमहि राजेन्द्र प्रसादात्ते युधिष्ठिर ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
विवर्धय़ति मित्राणि तथारींश्चापकर्षति |
३५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
विवर्धय़िषवो द्रौणेर्महिमानं महात्मनः ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
विवर्माणौ व्यराजेतां निर्मुक्ताविव पन्नगौ ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
विवशां धर्षय़ित्वा च कां त्वं प्रीतिमवाप्स्यसि ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
विवशाश्चापतन्दीप्तं देहाभावाय़ पावकम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
मृत्युरु उवाच
विवशौ कालवशगावावां तद्दिष्टकारिणौ |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
विवस्वतः सुतो जज्ञे यमो वैवस्वतः प्रभुः |
१० क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
विवस्वतः सुतो राजन्परमर्षिः प्रतापवान् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
विवस्वतस्त्वं तनय़ः प्रतापवां; स्ततो हि वैवस्वत उच्यसे वुधैः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
व्यास उवाच
विवस्वतेऽश्वशिरसे चतुर्मूर्तिधृते सदा ||
९५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
व्राह्मण उवाच
विवस्वतो गच्छति पर्ययेण; वोढुं भवांस्तं रथमेकचक्रम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
विवस्वतो मनुः |
७ ग
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
विवस्वतो वै कौन्तेय़ सावित्र्यवरजा विभो |
७ क
वन पर्व
अध्याय २७८
नारद उवाच
विवस्वानिव तेजस्वी वृहस्पतिसमो मतौ |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
विवस्वान्भगवान्स्वस्ति करोतु तव सर्वशः |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽव्रवीत् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
विवस्वान्वीर्यवान्ह्रीमान्कीर्तिमान्कृत एव च |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
विवाजश्च सुवाजश्च तस्मिन्युक्तौ रथे हय़ौ |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
विवादितोऽसौ न हि मादृशैर्हि; सिंहीकृतस्तेन वदत्यभीतः |
२० क
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
विवादिनावनुप्राप्तौ तावुभौ प्रत्यवेदय़त् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
विवादे साम्नि मुनिभिर्व्रह्मघ्नो वै भवानिति |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
युधिष्ठिर उवाच
विवादो व्याहृतः पूर्वं तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
विवान्हि पवनः स्थानाद्वृक्षानुच्चावचानपि |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
विवारय़िषुराचार्यं शरवर्षैरवाकिरत् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
विवासिता न दग्धाश्च कथञ्चित्तस्य शासनात् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
विवास्यमानानस्थाने कौन्तेय़ान्भरतर्षभान् ||
९ ग
आदि पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
विवास्यमानान्कौन्तेय़ाननुमंस्यन्ति कर्हिचित् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
विवाहं कारय़ामास भीष्मः पाण्डोर्महात्मनः ||
५ ग
आदि पर्व
अध्याय १०६
वैशम्पाय़न उवाच
विवाहं कारय़ामास विदुरस्य महामतेः ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
विवाहं कारय़ामास सौभद्रस्य महात्मनः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
विवाहं कारय़िष्यन्तं भीष्मं काशिपतेः सुता |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय ९
सूत उवाच
विवाहं तौ च रेमाते परस्परहितैषिणौ ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ८
सूत उवाच
विवाहं स्थापय़ित्वाग्रे नक्षत्रे भगदैवते ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २४८
वैशम्पाय़न उवाच
विवाहकामः शाल्वेय़ान्प्रय़ातः सोऽभवत्तदा ||
६ ख