आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
वनमेतच्चरिष्यन्ति पुरुषा वनचारिणः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
युधिष्ठिर उवाच
वनमेव गमिष्यामि तस्माद्धर्मचिकीर्षय़ा ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
दुर्योधन उवाच
वनमेव गमिष्यामि वसानो मृगचर्मणी |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
भीष्म उवाच
वनराजी यथा चित्रा वसन्ते कुसुमाचिता ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
वनराजीस्तु पश्येमाः प्रिय़ालानां मनोरमाः |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
जनमेजय़ उवाच
वनवासं गते विप्र धृतराष्ट्रे महीपतौ |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
वनवासं गमिष्यामि समय़ो ह्येष नः कृतः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
वनवासकृतं दुःखं भविष्यति सुखाय़ नः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
वनवासगतानां च पाण्डवानां महात्मनाम् |
११० क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
वनवासगताय़ाश्च सैन्धवेन दुरात्मना |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
वनवासनिवृत्तेषु भवत्सु कुरुनन्दन |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
वनवासपरिक्लिष्टां जगाम मनसा प्रिय़ाम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
वनवासमदुःखार्हा दारुणं प्रत्यपद्यत ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
४९
वृहदश्व उवाच
वनवासमदुःखार्हो भार्यया न्यवसत्सह ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
वनवासाद्विमुक्तस्तु प्राप्तः पैतामहं पदम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
वनवासान्निवृत्ताः स्म न च युद्धेषु निर्जिताः ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
वनवासाय़ गच्छन्तीं रुदती भद्रय़ा सह ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
वनवासाय़ चक्रुस्ते मतिं पार्थाः पराजिताः |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
वनवासाय़ धर्मज्ञा धर्मज्ञेन नृपेण च ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
जनमेजय़ उवाच
वनवासे च कौरव्यः किय़न्तं कालमच्युतः |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
वनवासे तदा त्रीणि नगरे दश पञ्च च ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४६
द्रोण उवाच
वनवासे ह्यनिर्वृत्ते दर्शय़ेन्न धनञ्जय़ः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
वनस्थमपि राज्यस्थः पाण्डवं कोऽतिजीवति ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
वनस्थांस्तानय़ं हन्तुमिच्छन्प्राणैर्विमोक्ष्यते ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३५
चित्रसेन उवाच
वनस्थान्भवतो ज्ञात्वा क्लिश्यमानाननर्हवत् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
वनस्थय़ा दुःखितय़ा शोचन्त्या मां विवाससम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
वनस्पतींश्चौषधीश्चाविशन्ति; अपो वाय़ुं पृथिवीं चान्तरिक्षम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
वनस्पतीनां पतय़े नराणां पतय़े नमः |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
वनस्पतीनां पतय़े नराणां पतय़े नमः |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
वनस्पतीनां मूलेषु टङ्केषु शिखरेषु च |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
वनस्पतीनोषधीश्च तेषां मूलफलानि च ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
वनस्पतीनोषधीश्च फलमूलं च ते विदुः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
वनस्पतीन्भक्ष्यफलान्न छिन्द्युर्विषय़े तव |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
वनस्पतीन्विचिन्वन्ती विजहार सखीवृता ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
वनस्पतेरपक्वानि फलानि प्रचिनोति यः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
वनाच्च वाय़ुः सुरभिः प्रवाय़े; त्तस्मिन्काले तमृषिं लोभय़न्त्याः |
४२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
वनाच्चापि किमानीता भवत्या वालका वय़म् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
वनाज्जगाम त्रिदिवं कालय़ोगेन भारत ||
४० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
वनात्फुल्लद्रुमाद्राजन्भ्रमराणामिव व्रजाः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
वनादस्माच्च कौन्तेय़ वनमन्यद्विचिन्त्यताम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
७९
सहदेव उवाच
वनादस्माद्विवासं तु रोचय़ेऽहमरिन्दम |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
वनानि क्रमशस्तात सर्वाण्येवाभ्यगच्छत ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
वनानि देवदारूणां मेघानामिव वागुराः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
वनानि रम्याणि सरांसि नद्यो; गुहा गिरीणां गिरिगह्वराणि |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
वनानि रम्याण्यथ पर्वतांश्च; नदीप्रदेशांश्च तदा विचेरुः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
वनानि सरितश्चैव शैलांश्च विविधद्रुमान् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
वनान्तरगताः सर्वे वित्रेसुर्मृगपक्षिणः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
वनान्निर्गमनं चैव सुखं मम भविष्यति ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
वनान्निष्क्रम्य गहनाद्वहवः कुरुसैनिकाः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
वनाय़ व्रज कौन्तेय़ न त्वं युद्धविशारदः ||
७१ ख