द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम राधेय़स्य पराक्रमम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम विजय़स्य पराक्रमम् ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम वीभत्सोर्हस्तलाघवम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम वृद्धय़ोश्चरितं महत् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम शिलानां प्लवनं यथा |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम शैनेय़चरितं महत् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम शैनेय़चरितं रणे |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम शैनेय़स्य पराक्रमम् |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम सम्प्रहारं सुदारुणम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम सूतपुत्रस्य मारिष |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम सूतपुत्रस्य लाघवम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम सौमदत्तेः पराक्रमम् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतमपश्याम हैडिम्वस्य पराक्रमम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
तत्राद्भुतममन्यन्त हार्दिक्यस्य पराक्रमम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राद्भुतान्यदृश्यन्त निमित्तानि महाहवे |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
तत्राद्यौ लोकनाथौ तौ कृशौ धमनिसन्ततौ ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राद्रिकेति विख्याता व्रह्मशापाद्वराप्सराः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
तत्राधाय़ शरं तीक्ष्णं भारघ्नं विमलं दृढम् |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
तत्राधिरथिभीमाभ्यां शरैर्मुक्तैर्दृढाहताः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्राध्यात्मगतिं देव एकाकी प्रविचिन्तय़न् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रानशनसङ्कल्पं कृत्वासीना वय़ं तदा |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रानिमित्ततो दैवात्सूतं कश्मलमाविशत् ||
१० ग
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रानुरूपं भीष्मेण ममाप्यत्र गिरं शृणु ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
तत्रान्तःपुरसम्वद्धं महच्चैत्ररथोपमम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
तत्रान्तरिक्षे वाणानां प्रगाढानां विशां पते |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
तत्रान्यस्य च संमर्दे पतितस्य विवर्मणः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रान्ये व्याहरन्ति स्म वानराः पटुमानिनः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
तत्रापत्यं समुत्पाद्य ततो जाय़ति मूषकः ||
७९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
तत्रापराणि दारूणि संसृज्यन्ते ततस्ततः |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तत्रापरे वध्यमाना मुहुर्मुहुरचेतसः |
९९ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
तत्रापरेऽमन्त्रय़न्त धर्मात्मानो भुजङ्गमाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
तत्रापश्यं मुनिगणान्समासीनान्सहस्रशः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
तत्रापश्यज्जराय़ुक्तामरजोम्वरधारिणीम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
तत्रापश्यत्तपोवृद्धं वय़ोवृद्धं च भार्गवम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापश्यत्प्रिय़ां भार्यां पाण्डवानां यशस्विनीम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापश्यत्स धर्मात्मा देवदेवर्षिपूजितम् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४
शल्य उवाच
तत्रापश्यत्सरो दिव्यं नानाशकुनिभिर्वृतम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापश्यद्द्रुमान्फुल्लान्विहगैर्वल्गु नादितान् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
तत्रापश्यन्दधीचं ते दिवाकरसमद्युतिम् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तत्रापश्यन्महात्मानं धार्तराष्ट्रं निपातितम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१०१
विष्णुरु उवाच
तत्रापश्यन्महात्मानं वारुणिं दीप्ततेजसम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापश्यन्महानीलं वैजय़न्तं महाप्रभम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रापश्यन्महाभागं शालवृक्षमुपाश्रितम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापश्यन्महाशङ्खं महामेरुमिवोच्छ्रितम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तत्रापश्यन्महेष्वासो भारद्वाजः प्रतापवान् |
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
तत्रापातय़तां राजञ्शिरस्यण्डानि खेचरौ |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्रापि च कृतोद्देशः समागमदिदृक्षुभिः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तत्रापि च मय़ा दृष्टा दुह्यमाना पय़स्विनी |
७७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
तत्रापि च विशेषोऽस्ति दिवि नीचोच्चमध्यमः ||
३७ ख