वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तद्वै पुत्रशतं जज्ञे शूराणामनिवर्तिनाम् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
तद्वै प्रवृत्तं तु यथा कथं चि; द्विमोक्षय़ेच्चाप्यसिसाय़कांश्च ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
तद्वै महामोहनमिन्द्रिय़ाणां; वुध्यस्व मा त्वां प्रलभेत राजन् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
तद्वै यथातथं वुद्ध्वा ज्ञानमाददते सताम् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
तद्वै वित्तं मातिदेवीर्मा जैषीः शकुने परम् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
तद्वै शस्त्रं शस्त्रविदां न शस्त्रं छेदनं स्मृतम् ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वै श्रुत्वा भीमसेनः कुरुमध्येऽत्यमर्षणः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी; निर्भर्त्स्योच्चैस्तं निगृह्यैव रोषात् |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी; भृशं निशश्वास तदार्तरूपः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
तद्वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां; यत्तद्राजन्नतिसृष्टं त्वय़ासीत् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
तद्वै सर्वं यन्मय़ोक्तं सभाय़ां; तद्धार्यतां यत्प्रवक्ष्यामि भूय़ः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
तद्वै सर्वानतिक्रम्य देवदानवराक्षसान् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
तद्वैरं संस्मरन्वीर योत्स्यते केशवार्जुनौ ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
तद्वो हृदि न कर्तव्यं मामनुज्ञातुमर्हथ ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्व्यर्थं सम्प्रपश्यामि मोहात्तव जनाधिप ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
तद्व्याख्यास्यामि ते तात श्रेय़स्करतरं सुखम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
तद्व्रवीतु भवान्क्षिप्रं किं करोमि किमिच्छसि |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
तद्व्रवीतु भवान्क्षिप्रं साधु तत्संविधीय़ताम् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तद्व्रवीहि करिष्यामो वचनात्तव भारत ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१०७
गङ्गो उवाच
तद्व्रवीहि नरश्रेष्ठ करिष्यामि वचस्तव ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
तद्व्रवीह्याशु सर्वेषामागमानां त्वमागमः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
तद्व्रह्म परमं प्रोक्तं तद्धाम परमं स्मृतम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
तद्व्रह्मचर्यस्य फलमृषीणामिह दृश्यते ||
३७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
धृतराष्ट्र उवाच
तद्व्राह्मणः पश्यति योऽत्र विद्वा; न्कथंरूपं तदमृतमक्षरं पदम् ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तद्व्रूहि त्वं महाप्राज्ञे यत्ते मनसि वर्तते ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
वासुदेव उवाच
तद्व्रूहि त्वं महाप्राज्ञे शुश्रूषे वचनं तव ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
तद्व्रूहि त्वं सुविस्रव्धो यत्त्वं वाचा वदिष्यसि |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
धृतराष्ट्र उवाच
तद्व्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलः शुचिः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
धृतराष्ट्र उवाच
तद्व्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो ह्यसि ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
तद्व्रूहि द्विजमुख्य त्वमस्माकं च प्रिय़ोऽतिथिः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
तद्वय़ं सहिता गत्वा भीष्ममाशु नरोत्तमम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
तदय़ं किं नु पापात्मा तव पुत्रः सुमन्दधीः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
तदय़ं पाण्डुपुत्रेण व्यसने वर्तता भृशम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
तदय़ुक्तं व्यवस्यन्ति वालाः पण्डितमानिनः ||
५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
तनवस्ते स्मृतास्तिस्रः पुराणज्ञैः सुरर्षिभिः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
तनुं स्पर्शे तथा सक्तां वाय़ुं नभसि चाश्रितम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भरद्वाज उवाच
तनुः क्षरति सर्वेषां कस्माद्वर्णो विभज्यते ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तनुत्यजां नृसिंहानामाहवेष्वनिवर्तिनाम् |
९८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
तनुत्रैः सतलत्रैश्च हारैर्निष्कैश्च भारत ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०८
मार्कण्डेय़ उवाच
तनुत्वात्सा सिनीवाली तृतीय़ाङ्गिरसः सुता ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
तनुभूताः स्म भद्रं ते दय़ा नः क्रिय़तामिति ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
तनुरुच्चः शिखी राजा शुद्धजाम्वूनदप्रभः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
धृतराष्ट्र उवाच
तनुरुच्छः शिखी राजा मिथ्योपचरितो मय़ा |
४७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
तनुवाससमत्युग्रमुमाभूषणतत्परम् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
तन्तवोऽप्याय़ता नित्यं तन्तवो वहुलाः समाः |
५७ क
विराट पर्व
अध्याय
३
सहदेव उवाच
तन्तिपाल इति ख्यातो नाम्ना विदितमस्तु ते |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तन्त्रं चेदं विश्वरूपं युवत्यौ; वय़तस्तन्तून्सततं वर्तय़न्त्यौ |
१५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
तन्त्रीस्वनसुखं रम्यं पुंस्कोकिलसमध्वनिम् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
तन्न जातु क्षमेद्द्रौणिर्जानन्पौरुषमात्मनः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
तन्न जानाति गाङ्गेय़ो न द्रोणो न च गौतमः |
१४ क