उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
अथ यो गुणसम्पन्नान्हृदय़स्याप्रिय़ानपि |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
अथ यो गुणसम्पन्नान्हृदय़स्याप्रिय़ानपि |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
प्रह्राद उवाच
अथ यो नैव प्रव्रूय़ात्सत्यं वा यदि वानृतम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
युधिष्ठिर उवाच
अथ यो विजिगीषेत क्षत्रिय़ः क्षत्रिय़ं युधि |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
अथ यो विनिकुर्वीत ज्येष्ठो भ्राता यवीय़सः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
पृथिव्यु उवाच
अथ यो व्राह्मणाक्रुष्टः पराभवति सोऽचिरात् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
अथ योगाद्विमुच्यन्ते कारणैर्यैर्निवोध मे |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
अथ योऽधर्मतः पाति राजामात्योऽथ वात्मजः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
७२
केशिन्यु उवाच
अथ योऽसौ तृतीय़ो वः स कुतः कस्य वा पुनः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
अथ रक्षा न मे सङ्ख्ये क्रिय़ते कुरुनन्दन |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
अथ राजन्महावाहुः सात्यकिर्युद्धदुर्मदः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
अथ राजन्यवैश्याभ्यां यद्यश्नीय़ात्तु केतितः |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अथ राजा त्रिगर्तानां सुशर्मा रथय़ूथपः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
अथ राजासने कस्मादुपविष्टोऽस्यलङ्कृतः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
अथ रात्र्यां व्यतीताय़ामशेषो नागरो जनः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
अथ राष्ट्रमुपाय़ेन भुज्यमानं सुरक्षितम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
अथ रुक्मरथो नाम मद्रेश्वरसुतो वली |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
अथ रुद्र उपाधावत्तावृषी तपसान्वितौ |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
अथ रुद्रविघातार्थमिषीकां जगृहे नरः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
अथ रूपं परं राजन्विभ्रतीं स्वेन तेजसा |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
अथ लोकमिमं जित्वा लोकं विजय़ते परम् ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
अथ लोकाः प्रकृतिमापेदिरे स्वस्थाश्च वभूवुः ||
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
अथ वक्ष्यसि मां मौर्ख्याद्भूय़ः परुषमीदृशम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
अथ वन्धपरिक्लिष्टो मार्जारो वीक्ष्य मूषकम् |
८४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वर्माणि चित्राणि काञ्चनानि वहूनि च |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
अथ वर्षशते पूर्णे धर्मः पुनरुपागमत् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
अथ वा कुञ्जरं मत्तमेक एव चरन्वने |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
अथ वा कृपणैरेतामुपनीतां जनार्दन |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वा गोसहस्राणि वहूनि च शुभानि च |
१० क
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
अथ वा जाय़मानस्य यच्छीलमनुजाय़ते |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
अथ वा तदुपादानात्प्राप्नुय़ुः कर्मणः फलम् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वा तानुपाय़ातो मत्स्यो जानपदैः सह |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
अथ वा तिष्ठ वीभत्सो सह सर्वैर्नरर्षभैः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
८
शकुनिरु उवाच
अथ वा ते ग्रहीष्यन्ति पुनरेष्यन्ति वा पुरम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
अथ वा ते घृणा काचित्प्राय़श्चित्तं चरिष्यसि |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वा ते भय़ं जातं दृष्ट्वार्जुनपराक्रमम् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
अथ वा ते मतिस्तत्र राजपुत्रि निवर्तते |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
अथ वा ते स्वभावोऽय़ं येन पार्थावकृष्यसे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वा ते स्वभावोऽय़ं येन पार्थिव कृष्यसे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
युधिष्ठिर उवाच
अथ वा तौ गतौ तत्र यदेतत्कीर्तितं त्वय़ा |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
अथ वा त्वां महीपाल शमय़िष्यन्ति वै द्विजाः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
अथ वा दुःखशैथिल्यं वीक्ष्य लिङ्गे कृता मतिः |
४९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वा दुर्मरं तात यदिदं मे सहस्रधा |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
अथ वा दुष्कृतस्य त्वं हर्ता तेषामरक्षिता |
६४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
अथ वा दैवतैः पार्थ सर्वशस्त्रास्त्रपारगः |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
अथ वा द्रुपदो राजा महद्भिर्वित्तसञ्चय़ैः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२९१
कुन्त्यु उवाच
अथ वा धर्ममेतं त्वं मन्यसे तपतां वर |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
अथ वा धर्मराज्ञाहमनुज्ञाता महाभुज |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
अथ वा न प्रवर्तेत योगतन्त्रैरुपक्रमेत् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
अथ वा नात्र चित्रं हीत्यभवद्वासवस्य तु |
१० क