द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे कर्णं भीमसेनः प्रतापवान् ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे क्रुद्धो जत्रुदेशे महावलः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे क्रुद्धो भरतानां महारथः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे क्रुद्धो वहुभिः कङ्कपत्रिभिः ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे तूर्णं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे तूर्णं स पपात ममार च ||
९९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे तूर्णमार्जुनिं परवीरहा ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे द्रोणं धृष्टद्युम्नो महारथः ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे पार्थं कङ्कपत्रैः शिलाशितैः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे भीमं भीमकर्मा महारथः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे राजन्कौरवेय़ान्समन्ततः ||
१०२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे राजन्मर्माण्युद्दिश्य वीर्यवान् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
विव्याध समरे राजन्स हतो न्यपतद्भुवि ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
विव्याध सर्वगात्रेषु लक्ष्मणं च महारथम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध सव्ये पार्श्वे तु स्तनाभ्यामन्तरे तथा ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध सात्यकिं तूर्णं साय़कानां शतेन ह ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
विव्याध साय़कैः पार्थश्चतुर्भिः पाण्डुनन्दनः ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
विव्याध साय़कैः षष्ट्या रक्षन्भीष्मस्य जीवितम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध साय़कैर्द्रोणं पुनः सुनिशितैर्दृढैः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध सुभृशं क्रुद्धस्तोत्त्रैरिव महाद्विपान् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
विव्याध सूतं निशितैश्चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध सोमदत्तस्तु सात्वतं नवभिः शरैः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध सोऽस्य तद्दिव्यमस्त्रमस्त्रेण जघ्निवान् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
विव्याध हृदि सौभद्रः स पपात व्यसुः क्षितौ ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध हृदय़े तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाव्रवीत् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
विव्याध हृदय़े तूर्णं प्रवरं सर्वधन्विनाम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
विव्याध हृदय़े तूर्णं प्रास्रवत्तस्य शोणितम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
विव्याध हृदय़े तूर्णं सिंहनादं ननाद च ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
विव्याधाते महात्मानावन्योन्यं शरवृष्टिभिः ||
७६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
विव्याधाधिरथिर्भीमं नवभिर्निशितैः शरैः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
विव्याधाभिद्रुतं वाणैर्भीमसेनं सकुञ्जरम् ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
विव्याधोरसि सङ्क्रुद्धः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
विव्याधोरसि सङ्क्रुद्धः सिंहवच्चानदन्मुहुः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
विव्यास वेदान्यस्माच्च तस्माद्व्यास इति स्मृतः ||
७३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
विव्यासैकं चतुर्धा यो वेदं वेदविदां वरः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
विव्रुवन्तु यथासत्यमेते वाद्य त्यजन्तु माम् ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
विव्रूत पृथिवीपाला वाक्यं मा वा कथञ्चन |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
विव्रूत मे यथातथ्यं श्रोतुमिच्छामि तं ह्यहम् ||
१४ ग
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
विव्रूय़ुस्तत्र ते प्रश्नं कामक्रोधवशातिगाः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
विशङ्का जाय़ते तस्मिन्वाक्यं तदपि दोषवत् ||
९३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
विशन्ति चावशाः पार्थ योगा योगवलान्विताः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
विशन्ति विप्रप्रवराः साङ्ख्या भागवतैः सह ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
विशन्निव महाशैलो महीं वज्रप्रपीडितः ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
विशल्यमरुजं चास्मै कथय़ित्वा युधिष्ठिरम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
विशल्यया महौषध्या दिव्यमन्त्रप्रय़ुक्तय़ा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
विशल्यौ चापि सुग्रीवः क्षणेनोभौ चकार तौ |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
विशश्च मान्याञ्शूद्रांश्च सर्वानानय़तेति च ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
विशश्राम स तेजस्वी राघवेणाभिनन्दितः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
विशश्रामाथ धर्मात्मा तीरं लव्ध्वेव पारगः ||
२४ ख