आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
तानव्रुवं पतमानस्ततोऽहं; सतां मध्ये निपतेय़ं कथं नु ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
तानव्रुवं यथाभूतमिदं कर्तास्मि संय़ुगे |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
तानव्रुवन्महात्मानः शिष्टाः प्राञ्जलय़स्तदा |
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
तानश्वांश्चोदय़ामास मनोमारुतरंहसः ||
१११ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
तानस्तानस्यमानांश्च किरीटी युद्धदुर्मदः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
तानस्य विशिखांस्तीक्ष्णानन्तरिक्षे विशां पते |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
तानस्यास्त्रेण चिच्छेद द्रौणिः सर्वास्त्रघातिना ||
२१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
तानहं निशितैर्भल्लैः शतशोऽथ सहस्रशः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
तानहं निशितैर्वाणैर्व्यधमं गार्ध्रवाजितैः |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
२
भीम उवाच
तानहं निहनिष्यामि प्रीतिं तस्य विवर्धय़न् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
तानहं पण्डितान्मन्ये विशेषा हि प्रसङ्गिनः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
तानहं माय़यैवाशु प्रतिगृह्य व्यनाशय़म् |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
तानहं रथनीडेभ्यः शरैः संनतपर्वभिः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
तानहं विवरं दृष्ट्वा प्राहिण्वं यमसादनम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
तानहं विविधैर्वाणैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
तानहं शरवर्षेण महता प्रत्यवारय़म् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
तानहं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम् ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
तानहं सम्प्रवक्ष्यामि शाश्वतान्लोकभावनान् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
तानहत्वा न पश्यामि सिद्धिमत्र परन्तप ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
तानह्नैवाधिगच्छेय़ं न चेद्धन्यां जय़द्रथम् ||
२८ ग
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
तानागतानभिप्रेक्ष्य मत्स्यो धर्मभृतां वरः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
तानागतान्द्विजश्रेष्ठान्विरूपाक्षो विशां पते |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तानागतान्स चिच्छेद सौमित्रिर्निशितैः शरैः |
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
तानागतान्समीक्ष्यैव धृतराष्ट्रो महीपतिः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
तानाचख्यौ तदा सूतः सर्वान्नामाभिनामतः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
तानानुपूर्व्याद्भगवान्वधे मातुरचोदय़त् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
तानापतत एवाजौ भीमसेनो महावलः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तानापतत एवाशु चिच्छेद परमासिना ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
तानापतत एवाशु पञ्चानां वै भुजच्युतान् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तानापतत एवाशु पूरय़ानान्रथस्वनैः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तानापतत एवाशु व्यूढानीकाः प्रहारिणः |
६३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
तानापतत एवाशु हतशेषाद्वलार्णवात् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
तानापतत एवासौ रामो वाणानजिह्मगान् |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
तानाप्तैः पुरुषैर्दूराद्घातय़ेथाः परस्परम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तानाप्नुय़ामहे लोकान्ये च पापकृतामपि ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तानाभाष्य महेष्वासान्प्राप्तकालमभाषत ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११
अर्जुन उवाच
तानावभाषे भगवान्पक्षी भूत्वा हिरण्मय़ः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
तानाशुगैरापततोऽहमाशु; निवार्य तूर्णं खगमान्ख एव |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
तानाह सर्वानृषिमुख्यानगस्त्यः; केनादत्तं पुष्करं मे सुजातम् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
उमो उवाच
तानि कर्माणि मे देव वद भूतपतेऽनघ ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
तानि चास्य शरीराणि शरैरहमताडय़म् ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
तानि चैकशतं विद्धि कुलानि भरतर्षभ ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
तानि जङ्घाजघन्यानि भारप्रत्यवराणि च ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
तानि जङ्घाजघन्यानि भारप्रत्यवराणि च ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
तानि जीवानि विक्रीय़ का मृतेषु विचारणा |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
तानि तत्र प्रभास्वन्ति रूपवन्ति च पाण्डवः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
तानि तान्यनुरक्तेन शक्यान्यनुतितिक्षितुम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तानि तान्यनुसन्दृश्य सङ्गस्थानान्यरिन्दम |
१३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
तानि तान्यभिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ||
५ ख