शान्ति पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
विशिष्टवुद्धीञ्शूरांश्च कथमेकोऽधितिष्ठति ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
विशिष्टस्य विशिष्टाच्च तुल्यौ दानप्रतिग्रहौ |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
विशिष्टा सर्वलोकेषु भविष्यसि च भामिनि ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
विशिष्टां वा नरव्याघ्र शीलवान्भव पुत्रक ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
विशिष्टाय़ा विशिष्टेन सङ्गमो गुणवान्भवेत् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
विशिष्टो राजशार्दूल नास्ति तत्र विचारणा ||
१२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
विशिष्यते स्त्रिय़ा भर्तुर्नित्यं प्रिय़हिते स्थितिः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णं भरतश्रेष्ठ हार्दिक्यः परवीरहा ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णः पर्वतो राजन्यथा स्यान्मातरिश्वना ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णकर्णास्यकरा विनिय़न्तृपताकिनः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
विशीर्णकवचं चैव तवास्मीति च वादिनम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
विशीर्णगलितोष्णीषः प्रकीर्णाम्वरमूर्धजः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
विशीर्णगात्रः पृथिवीं परासुः प्रपतिष्यति ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
विशीर्णदन्तान्गिर्याभान्भिन्नकुम्भान्सशोणितान् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णनागाश्वरथध्वजौघं; भीष्मेण वित्रासितसर्वय़ोधम् |
७८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णनागाश्वरथप्रवीरं; वलं त्वदिय़ं यमराष्ट्रकल्पम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णरथजालाश्च केशेष्वाक्षिप्य दन्तिभिः |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
विशीर्णवन्धने तस्मिन्गते कृष्णाजिने महीम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णवर्माभरणाम्वराय़ुधै; र्वृता निशान्तैरिव पावकैर्मही ||
१९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णशस्त्रैर्विनिकृत्तवन्धुरै; र्निकृत्तचक्राक्षय़ुगत्रिवेणुभिः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णा गिरय़ो यद्वन्निःश्वसद्भिर्महोरगैः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णाश्च रथा भूमौ भग्नचक्रय़ुगध्वजाः ||
१२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
विशीर्णे कार्मुके राजन्प्रक्षीणेषु च वाजिषु |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
विशीर्णैर्विप्रधावन्तो दृश्यन्ते स्म दिशो दश |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
विशीर्यन्तीं नावमिवार्णवान्ते; रत्नाभिपूर्णां मकरस्य पृष्ठे |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
विशीला भिन्नमर्यादा नित्यं सङ्कीर्णमैथुनाः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
विशुद्धं च मनो यस्य वुद्धिश्चाव्यभिचारिणी ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
विशुद्धः स द्विजातिर्वै विज्ञेय़ इति मे मतिः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
विशुद्धदंष्ट्रं प्रगृहीतशङ्खं; विचुक्रुशुः प्रेक्ष्य कुरुप्रवीराः ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
विशुद्धधर्मा शुद्धेन वुद्धेन च स वुद्धिमान् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
विशुद्धभावमत्यन्तं सदा प्रिय़हिते रतम् |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
विशुद्धमनसो दान्ताः श्रद्धादमसमन्विताः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
विशुद्धरश्मिस्तपनः शशी च; जय़स्यैतद्भाविनो रूपमाहुः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
विशुद्धवीर्यांश्चरणोपपन्ना; न्कुले जातान्सर्वधर्मोपपन्नान् ||
७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
विशुद्धोऽसि महाभाग सुखी विगतकल्मषः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
विशुद्धय़ोगाय़ वुधाय़ चैव; क्रिय़ावतेऽथ क्षमिणे हिताय़ ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
विशेषं चैव कर्तास्मि पुनः पुनरतीव हि ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
विशेषं तव कल्याणि प्रय़च्छामि वरं वरे |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
विशेषं न स्म विविदुर्हैडिम्वभगदत्तय़ोः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
विशेषं नाधिगच्छामि पतितस्याधनस्य च ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
विशेषं नाध्यगच्छाम समावास्तां नरर्षभौ ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
विशेषकार्यविद्भिश्च मोक्षधर्मपराय़णैः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
विशेषत इहास्माकं निमित्तानि विनाशने |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
विशेषतः कुरुश्रेष्ठ प्रजापालनमीप्सता ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
विशेषतः कौरवाणां ध्वजिन्यामतिदारुणम् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
विशेषतः पार्थिवेषु व्रीडां न कुरुषे कथम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
विशेषतः पुत्रगृद्धी हीनः प्रजननात्स्वय़म् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
४५
जनमेजय़ उवाच
विशेषतः प्रेक्ष्य पितामहानां; वृत्तं महद्वृत्तपराय़णानाम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
विशेषतः सूतपुत्रो राजा चैव सुय़ोधनः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
विशेषतश्च भीमेन संरव्धेनाभिचोदिताः ||
२४ ख