वन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
सोऽहमेत्य कुरुश्रेष्ठ द्वारकां पाण्डुनन्दन |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
सोऽहमेवं गते कृष्ण निमग्नः शोकसागरे |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
सोऽहमेवं गते मग्नो भीष्मागाधजलेऽप्लवः ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३
सहदेव उवाच
सोऽहमेवं चरिष्यामि प्रीतिरत्र हि मे सदा |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
सोऽहमेवं प्रणीतानि ज्ञात्वा शास्त्राणि तत्त्वतः |
१५७ क
आदि पर्व
अध्याय
३४
एलापत्र उवाच
सोऽहमेवं प्रपश्यामि वासुके भगिनीं तव |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽहमेवं विदित्वैतत्प्रपश्यामि शुचिस्मिते |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सोऽहमेवङ्गतो मुक्तो जातास्थस्त्वय़ि भिक्षुकि |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
सोऽहमेवोत्तरे भागे क्रमाक्षरविभागवित् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
सोऽहमैश्वर्यमोहेन मदाविष्टो युधिष्ठिर |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
सोऽऽश्रमाणां मुखं तात कर्मणस्तत्फलं विदुः ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
सोऽय़ं किं कर्म कौन्तेय़ः करिष्यति धनञ्जय़ः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सोऽय़ं कृत्स्नो व्राह्मणार्थो राजार्थश्चाप्यसंशय़म् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
सोऽय़ं गुरुतरो भारः सैन्धवान्मे समाहितः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं चतुर्णामेतेषामाश्रमाणां दुराचरः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं जातो मृतस्तात पश्यैनं पुरुषर्षभ |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
सोऽय़ं तप्यति तेजस्वी तपो घोरं दुरासदम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
सोऽय़ं ते वन्धुकामाय़ा अशृण्वन्त्या वचो मम |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
सोऽय़ं तेनाभ्यनुज्ञात उपकारेप्सय़ा द्विजः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं त्वमिह सङ्क्रान्तो विक्रमेण वसुन्धराम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽय़ं त्वय़ा महावाहो शमितो देवकण्टकः ||
७३ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
सोऽय़ं दुर्योधनेनार्थो लुव्धेनादीर्घदर्शिना |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
सोऽय़ं द्यूतप्रवादेन श्रिय़ा प्रत्यवरोपितः |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
सोऽय़ं नारीमुपाश्रित्य शेते राजा गतासुवत् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
सोऽय़ं नृपतिराय़ात इत्येवं समचिन्तय़त् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
सोऽय़ं पचति कालो मां वृक्षे फलमिवागतम् ||
८४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं पांसुषु शेतेऽद्य पश्य कालस्य पर्ययम् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१७०
व्राह्मण्यु उवाच
सोऽय़ं पितृवधान्नूनं क्रोधाद्वो हन्तुमिच्छति |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
सोऽय़ं प्रतिज्ञां तां चापि पारय़ित्वारिकर्शनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
भीष्म उवाच
सोऽय़ं प्रपद्यतेऽध्वानं चिराय़ ध्रुवमध्रुवः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
सोऽय़ं प्राप्तस्तवाक्षेपं पश्य साफल्यमात्मनः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं भूमौ परिश्रान्तः शेते प्राकृतवत्कथम् ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५५
विदुर उवाच
सोऽय़ं मत्तोऽक्षदेवेन मधुवन्न परीक्षते |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
सोऽय़ं मम जय़ो व्यक्तं दीर्घकालं भविष्यति |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
सोऽय़ं मम जय़ो व्यक्तं दीर्घकालं भविष्यति |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
सोऽय़ं मम जय़ो व्यक्तं व्यर्थ एव भविष्यति |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
सोऽय़ं मां समनुप्राप्तः प्रत्यक्षं भवतां हि यः |
२३ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं माद्रवतीपुत्रः कस्मान्निपतितो भुवि ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं मानुषवन्नाम हरिरास्तेऽरिमर्दनः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
सोऽय़ं मय़ा च सहितो नारदेन च पन्नगः |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं मय़ाभ्यनुज्ञातस्त्वय़ा च पृथिवीपते |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
सोऽय़ं राजंस्त्वय़ा शत्रुः समे पथि निवेशितः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
सोऽय़ं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
सोऽय़ं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
सोऽय़ं राज्ञो विराटस्य सभास्तारो युधिष्ठिरः ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
सोऽय़ं लोकसमावर्तो मर्त्यानां भरतर्षभ |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं वत्से महाभार आहितस्त्वय़ि साम्प्रतम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं वने मूलफलेन जीव; ञ्जटी चरत्यद्य मलाचिताङ्गः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं वलस्थो मूढश्च न करिष्यति ते वचः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
सोऽय़ं वह्निरुपागम्य पादमूले ममान्तिकम् |
३६ क