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शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
तत्र शक्रपुरोगाश्च लोकपालाः समागताः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
तत्र शक्रोपमाः सर्वे राजानो विनिवेशिताः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
तत्र शङ्कुपताकं च युगान्तं कल्पमेव च |
५८ क
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
तत्र शल्यरथं राजन्विचरन्तं महाहवे |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
तत्र शव्दो महानासीत्तव तेषां च भारत |
२ क
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र शुक्लाम्वरधरौ पितरावस्य पूजितौ |
७ क
वन पर्व
अध्याय ६३
वृहदश्व उवाच
तत्र शुश्राव मध्येऽग्नौ शव्दं भूतस्य कस्यचित् |
२ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र शूलगदापाणिर्व्यूढोरस्को महाभुजः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
तत्र शृङ्गे हिमवतो मेरौ कनकपर्वते |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
तत्र शेषं न पश्यामि प्रविष्टे सव्यसाचिनि |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र शोचसि राजेन्द्र विपरीतमिदं तव ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तत्र श्रीर्विजय़ो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ||
७८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
युधिष्ठिर उवाच
तत्र श्रुतिस्तु परमा सुवर्णं दक्षिणेति वै |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र श्लोकौ भवतः ||
३० ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
तत्र संशय़ितादर्थाद्योऽर्थो निःसंशय़ो भवेत् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
तत्र सक्ता विपद्यन्ते मुच्यन्ते च वलान्विताः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र सङ्कलना नास्ति राज्ञामय़ुतशस्तदा |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
तत्र सञ्चेष्टमानस्य संलक्ष्यं ते विचेष्टितम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामय़म् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र सन्ध्यामुपासीत व्राह्मणः संशितव्रतः |
८२ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र सप्तर्षिकुण्डेषु स्नातस्य कुरुपुङ्गव |
५९ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र सप्तर्षिभिः सार्धमारुहेथा महामुने ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र सभ्रातृकः स्नात्वा स्तूय़मानो महर्षिभिः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र सम्पूजितौ तेन विधिदृष्टेन कर्मणा |
५ क
विराट पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र सम्प्रेषितामेनां विजने निरवग्रहाम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
तत्र सम्यङ्मनो नाम त्यागशास्त्रमनुत्तमम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तत्र सर्वत्र दुष्टात्मा कर्णः पापमतिर्मुखम् ||
६६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तत्र सर्वत्र दुष्टात्मा कर्णो मूलमिहार्जुन ||
६० ग
वन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तत्र सर्वत्र वक्तव्यं मन्यन्ते शास्त्रकोविदाः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
तत्र सर्वसहाः क्षान्ता वत्सला गुरुवर्तिनः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्याय़तनानि च |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
तत्र सर्वात्मना मन्ये भीष्मस्यैवाभिपालनम् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
तत्र सर्वात्मना युक्तो वक्ष्ये कार्यधुरं तव ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
तत्र सर्वे गमिष्यामो भीमार्जुनपदैषिणः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र सर्वे सुराः स्कन्दमभ्यषिञ्चन्नराधिप |
७ क
वन पर्व
अध्याय २८८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र सा व्राह्मणं गत्वा पृथा शौचपरा सती |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र साक्षात्पशुपतिर्दिव्यैर्भूतैः समावृतः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
तत्र सात्यकिपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र साध्यास्तथा विश्वे मरुतोऽथाश्विनावपि |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
तत्र सामानि गाय़न्ति तानि चाहुर्निदर्शनम् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
तत्र सारथिरेष्टव्यः सर्वैरेतैर्विशेषवान् |
१०४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
तत्र सिद्धा महाराज सम्पतन्तोऽव्रुवन्वचः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र सीता मय़ा दृष्टा रावणान्तःपुरे सती |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र सैन्यं तथाय़ुक्तं ददर्श स पुरोहितः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र सौगन्धिकानां स द्रुमाणां पुण्यगन्धिनाम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
तत्र सौवलकाः क्रुद्धा वार्ष्णेय़स्य रथोत्तमम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तत्र स्थितमपश्याम धृष्टद्युम्नं महारथम् |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र स्थिता नरा राजन्रौहिणेय़स्य शासनात् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
तत्र स्थूणस्य भवनं सुधामृत्तिकलेपनम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नातस्तु धर्मज्ञ व्रह्मचारी समाहितः |
१७२ ख