शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तव जीवितमिच्छामि त्वं ममेच्छसि जीवितम् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
स्थाणुरु उवाच
तव तेजोग्निना देव प्रजा दह्यन्ति सर्वशः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
११५
पाण्डुरु उवाच
तव त्विदं मतं ज्ञात्वा प्रय़तिष्याम्यतः परम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तव दर्शनमन्विच्छन्पाण्डवाभ्येति सात्यकिः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
तव दिव्यानि चास्त्राणि विक्रमश्च परन्तप |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
तव दुःखोपपन्नाय़ा यैराचरितमप्रिय़म् |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तव दुःशासनो मन्त्री राधेय़श्च दुरात्मवान् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
तव दुर्मन्त्रिते राजन्दुर्योधनकृतेन च |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
तव दुर्मन्त्रिते राजन्नतीतं किं नु शोचसि ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
तव दुर्मन्त्रिते राजन्यथा नार्हः स भारत ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
तव दुर्मन्त्रिते राजन्सपुत्रस्य विशां पते ||
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तव दुर्मन्त्रिते राजन्सहपुत्रस्य भारत ||
८५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
तव दृष्ट्वा तु तनय़ान्भीमसेनसमीपगान् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसाः |
१२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तव दोषात्पुरा वृत्तं द्यूतमेतद्विशां पते |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तव दोषेण युद्धं च प्रवृत्तं सह पाण्डवैः |
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
तव धर्माश्रिता वुद्धिस्तेषां वैराश्रिता मतिः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तव धर्मेण धर्मज्ञ नित्यमेवाभितोषिताः ||
९४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तव धैर्यं च वीर्यं च पाञ्चालाः पाण्डवैः सह |
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
तव नरवरवर्यास्तान्दशैकं च वीरा; न्प्रवरशरवराग्र्यैस्ताडय़न्तोऽभ्यरुन्धन् |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
तव निर्गुणतां ज्ञात्वा पक्षपातं सुतेषु च |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
तव नैकस्य पर्याप्तो रावणः सगणो युधि ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
तव नैतद्धि सदृशं पुत्रस्थाने हि मे भवान् |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
तव पत्नीद्वय़े जातो द्विजातिवरशासनात् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
२२०
मार्कण्डेय़ उवाच
तव पारिषदा घोरा य एते पिशिताशनाः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
तव पार्थिव सङ्कल्पं चिन्तय़न्त्याः पुनः पुनः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्र कदा भूय़ो मुखं द्रक्ष्यामि निर्व्रणम् ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रं तथा हत्वा कत्थमानं वृकोदरम् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रः सदा सङ्ख्ये कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
तव पुत्रः सहामात्यः क्षणेन न भविष्यति ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
तव पुत्रशतं चैव कर्णः पञ्च च पाण्डवाः |
४० क
वन पर्व
अध्याय
१०
इन्द्र उवाच
तव पुत्रसहस्रेषु पीड्यमानेषु शोभने |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रस्य ते दृष्ट्वा विक्रमं तं महात्मनः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
तव पुत्रा दुरात्मानः क्रोधलोभपराय़णाः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रा दुरात्मानः पापेष्वभिरताः सदा |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
तव पुत्रा दुरात्मानः प्रतप्ताश्चैव मन्युना |
१८३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रा महाराज राजानश्चानुसारिणः ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तव पुत्रा हताः सर्वे द्रौपदेय़ाश्च भारत |
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्राः कृतोत्साहाः पर्यवर्तन्त ते ततः |
५० क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्राश्च कार्त्स्न्येन जुगुपुः शल्यमाहवे ||
३२ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रे गते स्वर्गं शोकार्तस्य ममानघ |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
गङ्गो उवाच
तव पुत्रे महावाहौ साङ्गोपाङ्गं महात्मनि ||
३४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रैर्वृतः कर्णः शुशुभे तत्र भारत |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
तव पुत्रो ममापत्यं हतवान्हिंसितो मय़ा |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रो महाराज जितकाशी मदोत्कटः ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रो महाराज नात्र शोचितुमर्हसि ||
१८ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रो महाराज प्रय़यौ यत्र सौवलः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७
कृष्ण उवाच
तव पूर्वाभिगमनात्पूर्वं चाप्यस्य दर्शनात् |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
तव प्रज्ञामुपश्रुत्य वासुदेवान्नरर्षभात् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
तव प्रतिज्ञां कुरुराज सत्यां; चिकीर्षमाणास्त्वदनु प्रिय़ं च |
७ क